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उच्चतर शिक्षा की नियामक प्रणाली में परिवर्तन

उच्चतर शिक्षा की नियामक प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन

18.1 दशकों से उच्चतर शिक्षा का विनियमन बहुत सख्त रहा है; जिसे बहुत कम प्रभाव के साथ विनियमित करने का प्रयास किया गया है। विनियामक प्रणाली का कृत्रिम और विघटनकारी स्वभाव बहुत ही बुनियादी समस्याओं से प्रभावित रहा है- जैसे कुछ ही निकायों में शक्ति का अत्यधिक केंद्रीयकरण, इन निकायों के बीच स्व-हितों का टकराव होता रहा है, जिसके परिणामस्वरूप जवाबदेही की कमी व्याप्त रही है। उच्चतर शिक्षा क्षेत्र को फिर से सक्रिय करने और इसे कामयाब करने के लिए नियामक प्रणाली को पूरी तरह से बदलने की आवश्यकता है।

18.2 उपर्युक्त मुद्दों को हल करने के लिए, उच्चतर शिक्षा की नियामक प्रणाली में यह सुनिश्चित करना होगा कि विनियमन, प्रत्यायन, फंडिंग और शैक्षणिक मानकों के निर्धारण जैसे विशेष कार्य, विशिष्ट, स्वतंत्र और सशक्त संस्थाओं/व्यवस्थाओं द्वारा संचालित किए जाएंगे। यह सिस्टम में चेक-एंड-बैलेंस बनाने, निकायों के आपसी हितों में टकराव को कम करने और कुछ निकायों में शक्तियों के अत्यधिक केन्द्रीयकरण को खत्म करने के लिए आवश्यक है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि चारों सांस्थानिक व्यवस्थाएं जो इन चार आधारभूत कार्यों को करती हैं स्वतंत्र रूप से अपना काम करने के साथ-साथ साझा उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए एक तारतम्यता के साथ काम करें। इन चार संरचनाओं को एक प्रमुख संस्था, भारतीय उच्चतर शिक्षा आयोग (एचईसीआई) के तहत चार स्वतंत्र व्यवस्थाओं के रूप में स्थापित किया जाएगा।

18.3 एचईसीआई का पहला अंग राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा विनियामक परिषद (एनएचईआरसी) होगा - यह उच्चतर शिक्षा क्षेत्र के लिए एक साझा और सिंगल पॉइंट रेगुलेटर की तरह काम करेगा जिसमें शिक्षक शिक्षा शामिल है किन्तु चिकित्सीय एवं विधिक शिक्षा शामिल नहीं है, और इस तरह नियामक प्रक्रिया में दोहराव और अव्यवस्था को समाप्त करेगा। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि व्यवस्था के भीतर वर्तमान में अनेकों विनियामक संस्थान उपस्थित हैं। इस एकल बिंदु विनियमन को सक्षम करने के लिए मौजूदा अधिनियमों की पुनर्सरचना और निरसन और विभिन्न मौजूदा नियामक निकायों के पुनर्गठन की आवश्यकता होगी।
एनएचईआरसी को 'लचीले लेकिन सख्त' और सुविधात्मक तरीके से संस्थानों को विनियमित करने के लिए स्थापित किया जाएगा, जिसका अर्थ है कि कुछ महत्वपूर्ण मामले - विशेष रूप से वित्तीय इमानदारी, सुशासन और सभी ऑनलाइन और ऑफ़लाइन वित्त संबंधी मसलों का स्व-प्रकटीकरण, ऑडिट, प्रक्रियाओं, इंफ्रास्ट्रक्चर, संकाय / कर्मचारी, पाठ्यक्रम और शैक्षिक प्रतिफलों को प्रभावी तरीके से नियंत्रित किया जाएगा। यह सूचना सभी उच्चतर-शिक्षा संस्थानों द्वारा अपनी वेबसाइट पर और सार्वजनिक वेबसाइटों जो कि एनएचईआरसी द्वारा संचालित की जाती हैं, पर मुहैया करवाई जाएंगी और समय-समय पर इन सूचनाओं को अद्यतन और सटीक रूप से उपलब्ध करवाया जाएगा। सार्वजनिक की गयी सूचनाओं से संबंधित हितधारकों और अन्य लोगों द्वारा किसी भी शिकायत या गुहार को एनएचईआरसी द्वारा सुना जाएगा और इसका हल किया जाएगा। एक निश्चित समय-अंतराल पर प्रत्येक उच्चतर शिक्षा संस्थान में रैंडम तरीके से दिव्यांग छात्रों सहित चुने गए छात्रों के मूल्यवान फीडबैक ऑनलाइन लिए जाएंगे।

18.4 ऐसे विनियमन को सक्षम बनाने की प्राथमिक प्रक्रिया प्रत्यायन होगी। इसलिए, एचईसीआई का दूसरा अंग एक 'मेटा-अक्क्रेडिटिंग' निकाय (meta-accrediting) होगा, जिसे राष्ट्रीय प्रत्यायन परिषद (एनएसी) के नाम से जाना जाएगा। संस्थाओं का प्रत्यायन (मान्यता देना) मुख्यतः: कुछ बुनियादी नियम-कायदों, सार्वजानिक स्व-प्रकटन, मजबूत गवर्नेंस, और परिणामों के आधार पर होगा। साथ ही यह पूरी प्रक्रिया मान्यता देने वाले संस्थानों के एक स्वतंत्र समूह द्वारा पूरी की जाएगी और एनएसी द्वारा इस सबकी निगरानी की जाएगी और इसका संचालन किया जाएगा । एनएसी द्वारा एक समुचित संख्या में संस्थानों को मान्यता देने के अधिकार हेतु कार्य किये जाएंगे। कम समय में ही ग्रेडेड मान्यता देने के लिए एक मजबूत प्रणाली को स्थापित किया जाएगा, जो सभी उच्चतर शिक्षा संस्थानों द्वारा स्वायत्तता, स्व-प्रशासन, और गुणवत्ता के तय मानकों को हासिल करने के लिए चरणबद्ध बेंचमार्क तय करेगी । परिणामस्वरुप, सभी उच्चतर शिक्षा संस्थान अपनी-अपनी संस्थान विकास योजना (आईडीपी) के जरिए अगले 15 वर्षों में मान्यता के उच्चतमस्तर को प्राप्त करने का उद्देश्य तय करेंगे और इस तरह ये संसथान एक स्व-संचालित डिग्री प्रदान करने वाले संस्थानों/क्लस्टर की तरह बनने के लिए प्रतिबद्ध बनेंगे। आगे चलकर यह प्रक्रिया वैश्विक मानकों के अनुसार एक द्विआधारी प्रक्रिया बन जाएगी।

18.5 एचईसीआई का तीसरा अंग उच्चतर शिक्षा अनुदान परिषद (एचईजीसी) का गठन किया जाएगा जो पारदर्शी मानदंडों के आधार पर उच्चतर शिक्षा के फंडिंग और वित्तपोषण का कार्य करेगा जिसमें संस्थानों द्वारा विकसित आईडीपी और इनके क्रियान्वयन के जरिए प्राप्त की गई उन्नति शामिल ह। एचईजीसी को छात्रवृत्ति के वितरण के लिए और नए फोकस क्षेत्रों को शुरू करने और बहु-विषयी क्षेत्रों में उच्चतर शिक्षा संस्थानों को गुणवत्ता कार्यक्रमों के प्रस्तावों के साथ उनके विस्तार के लिए विकासात्मक निधियों का कार्य भार सौंपा जाएगा।

18.6 एचईसीआई का चौथा विभाग सामान्य शिक्षा परिषद (जीईसी) होगा, यह उच्चतर शिक्षा कार्यक्रमों के लिए अपेक्षित परिणाम तय करेगा, जिन्हें ' स्नातक परिणामों ' के नाम से जाना जाएगा । जीईसी द्वारा एक राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा योग्यता फ्रेमवर्क (एनएचईक्यूएफ) तैयार किया जाएगा जो कि राष्ट्रीय कौशल योग्यता फ्रेमवर्क (एनएसक्यूएफ) से संगत होगा ताकि व्यवसायिक शिक्षा को उच्चतर-शिक्षा आसानी से समन्वित किये जाने में आसानी हो। इस तरह के सीखने के परिणामों के संदर्भ में एनएचईक्यू एफ द्वारा अग्रणी उच्चतर शिक्षा योग्यता का निर्देशन किया जाएगा जो एक डिग्री / डिप्लोमा / प्रमाण-पत्र के रूप में होगा। इसके अलावा, जीईसी, एनएचईक्यूएफ के माध्यम से क्रेडिट ट्रांसफर, समानक आदि मुद्दों के लिए समानुरूप और सुविधाजनक मानदंड स्थापित करेगा । जीईसी उन विशिष्ट कौशल की पहचान करेगा जो छात्रों को अपने शैक्षणिक कार्यक्रम के दौरान 21 वीं शताब्दी के कौशल के साथ पूर्ण विकसित शिक्षार्थियों को तैयार करने के उद्देश्य से प्राप्त करना चाहिए।

18.7 भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर).वेटरनरी काउंसिल ऑफ इंडिया (वीसीआई), राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई),आर्किटेक्चर काउंसिल (सीओए), फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई)राष्ट्रीय व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण परिषद (एनसीवीईटी) आदि का पुनर्गठन व्यावसायिक मानक सेटिंग निकायों (पीएसएसबी) के रूप में किया जाएगा; वे उच्चतर शिक्षा प्रणाली में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे और उन्हें जीईसी के सदस्य बनने के लिए आमंत्रित किया जाएगा। ये निकाय, पीएसएसबी के रूप में पुनर्गठन के बाद, जीईसी के सदस्यों के रूप में पाठ्यक्रम संरचना, शैक्षणिक मानकों को निर्धारित करने और उनके डोमेन / अध्ययन के विषय के शिक्षण, अनुसंधान और विस्तार के बीच समन्वय करना जारी रखेंगे। जीईसी के सदस्यों के रूप में, वे पाठ्यक्रम के ढांचे को निर्दिष्ट करने में मदद करेंगे, जिसके आधार उच्चतर शिक्षा संस्थान अपना स्वयं का पाठ्यक्रम तैयार कर सकते हैं। इस प्रकार, पीएसएसबी बिना किसी नियामक भूमिका के लर्निंग और प्रैक्टिस के विशेष क्षेत्रों में मानकों या अपेक्षाओं को निर्धारित करेगा। सभी उच्चतर शिक्षा संस्थान यह तय करेंगे कि उनके शैक्षणिक कार्यक्रम अन्य विचारों के बीच किस तरह से तय मानकों पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं और यदि आवश्यक हो तो वे पीएसएसबी/मानक-सेटिंग निकायों से सहयोग लेने में भी समर्थ होंगे।

18.8 इस तरह की संरचना विभिन्न भूमिकाओं के बीच आपसी हितों के टकराव को समाप्त करते हुए; प्रत्येक की भूमिका एवं कार्यों को एक दूसरे से अलग करने के सिद्धांत को कायम करेगी। इसका उद्देश्य कुछ बुनियादी मसलों पर ध्यान देते हुए उच्चतर शिक्षा संस्थानों को सशक्त बनाना भी है। इससे जुड़ी जिम्मेदारियां और जवाबदेही उच्चतर शिक्षण संस्थानों के अनुरूप होगी । सार्वजनिक और निजी उच्चतर शिक्षण संस्थानों के बीच अपेक्षानुरूप किसी तरह का भेद नहीं किया जाएगा |

18.9 इस तरह के परिवर्तन के लिए मौजूदा संरचनाओं और संस्थानों के लिए यह आवश्यकता होगी कि वे खुद को सुदृढ़ कर सकें और तरह-तरह की विकास क्रमिकता से गुजर सकें । कार्यों के पृथक्करण का मतलब होगा कि एचईसीआई के तहत प्रत्येक अंग को एक नई एकल भूमिका पर ले जाया जाएगा जो नई नियामक योजना में प्रासंगिक, सार्थक और महत्वपूर्ण है।

 18.10 विनियमन के लिए सभी स्वतंत्र संरचनाओं का कार्यकरण नियमन (एनएचईआरए) मान्यता (एनएसी), निधियन (एचईजीसी) और अकादेमिक मान्यता (जीईसी) एक वृहद और स्वायत्त निकाय (एचईसीआई) सार्वजनिक प्रकटीकरण नीति पर आधारित होगा और अपने कार्यों दक्षता, और पारदर्शिता को सुनिश्चित करने के लिए और मानव इंटरफेस कम करने के लिए अधिक से अधिक प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करेंगे। बुनियादी सिद्धांत यह होगा कि प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल से पहचान- मुक्त और पारदर्शी नियामक हस्तक्षेप किया जा सके। कड़े कदम के साथ कठोर अनुपालन उपायों को सुनिश्चित किया जाएगा, जिसमें अनिवार्य जानकारी के गलत प्रकटीकरण के लिए दंड की सिफारिश भी शामिल है, ताकि उच्चतर शिक्षा संस्थानों को न्यूनतम मानदंडों और मानकों के अनुरूप बनाया जा सके। एचईसीआई खुद इसके चारों अंगों के बीच किसी भी प्रकार के विवाद का निपटारा करेगा। एचईसीआई एक स्वतंत्र निकाय होगा जिनमें प्रासंगिक क्षेत्रों में काम कर रहे सत्यनिष्ठ, प्रतिबद्ध उच्चतर श्रेणी के विशेषज्ञ होंगे जिनके पास सार्वजानिक सेवाओं में योगदान देने का विशिष्ट अनुभव होगा। एचईसीआई का भी खुद का अपना एक छोटा, स्वतंत्र निकाय होगा जिसमें उच्चतर शिक्षा में प्रसिद्ध सामाजिक सरोकारों वाले विशेषज्ञ शामिल होंगे, जो एचईसीआई की सत्यनिष्ठा और प्रभावी कार्यकुशलता को संचालित करेंगे और इसकी निगरानी करेंगे। एचईसीआई के भीतर कार्य निष्पादन हेतु उपयुक्त प्रक्रिया का निर्माण किया जाएगा , जिसमें अधिनिर्णय भी शामिल है।

18.11 नए गुणवत्तापूर्ण उच्चतर शिक्षण संस्थानों को स्थापित करना भी बहुत आसान हो जाएगा। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि ये जन सेवा के भाव से दीर्घावधि के लिए वित्तीय सहायता के साथ स्थापित किए गए हैं। केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले उच्चतर शिक्षण संस्थान को अपने संस्थानों का विस्तार करने के लिए मदद मिलेगी, और इससे बड़ी संख्या में छात्रों और संकायों के साथ-साथ विषयों और कार्यक्रमों का विस्तार हो सकेगा। उच्चतर शिक्षण संस्थानों का गुणवत्तापूर्ण एवं उच्चतर-शिक्षा तक पहुँच का विस्तार करने के उद्देश्य से उनके लिए सार्वजनिक परोपकारी साझेदारी मॉडल भी शुरू किए जा सकते हैं ।

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