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समतामूलक और समावेशी शिक्षा : भाग 1

समतामूलक और समावेशी शिक्षा: सभी के लिए अधिगम

शिक्षा नीति 2020 अध्याय 6 भाग 1

6.1 शिक्षा, सामाजिक न्याय और समानता प्राप्त करने का एकमात्र और सबसे प्रभावी साधन है । समतामूलक और समावेशी शिक्षा न सिर्फ स्वयं में एक आवश्यक लक्ष्य है, बल्कि समतामूलक और समावेशी समाज निर्माण के लिए भी अनिवार्य कदम है, जिसमें प्रत्येक नागरिक को सपने संजोने, विकास करने और राष्ट्र हित में योगदान करने का अवसर उपलब्ध हों ।
यह शिक्षा नीति ऐसे लक्ष्यों को लेकर आगे बढ़ती है जिससे भारत देश के किसी भी बच्चे के सीखने और आगे बढ़ने के अवसरों में उसकी जन्म या पृष्ठभूमि से संबंधित परिस्थितियां बाधक न बन पायें। यह नीति इस बात की पुनः पुष्टि करती है कि स्कूल शिक्षा में पहुँच, सहभागिता और अधिगम परिणामों में सामाजिक श्रेणी के अंतरालों को दूर करना सभी शिक्षा क्षेत्र विकास कार्यक्रमों का मुख्य लक्ष्य होगा । इस अध्याय को अध्याय 14 के साथ पढ़ा जाए जिसमें उच्चतर शिक्षा में समता और समावेशन के मुद्दों पर चर्चा की गई है।

6.2 यद्यपि, भारतीय शिक्षा प्रणाली और क्रमिक सरकारी नीतियों ने विद्यालयी शिक्षा व्यवस्था के सभी स्तरों में लिंग और सामाजिक श्रेणियों के अंतरालों को कम करने की दिशा में लगातार प्रगति की है किन्तु असमानता आज भी देखी जा सकती है - विशेषकर माध्यमिक स्तर पर, हम सामाजिक - आर्थिक रूप से वंचित ऐसे समूहों को देख सकते हैं जो शिक्षा के क्षेत्र में भूतकाल से ही पीछे रहे हैं। सामाजिक - आर्थिक रूप से वंचित (एसईडीजी) इन समूहों को लिंग (विशेष रूप से महिला व ट्रांस जेंडर व्यक्ति), सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान (जैसे -अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, ओबीसी और भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यक), भौगौलिक पहचान ( जैसे - गाँव, कस्बे व आकांक्षी जिले के विद्यार्थी, विशेष आवश्यकता (सीखने से संबंधित अक्षमता सहित) और सामाजिक - आर्थिक स्थिति (जैसे कि प्रवासी समुदाय, निम्न आय वाले परिवार, असहाय परिस्थिति में रहने वाले बच्चे, बाल-तस्करी के शिकार बच्चे या बाल-तस्करी के शिकार बच्चों के बच्चे, अनाथ बच्चे जिनमें शहरों में भीख मांगने वाले व शहरी गरीब भी शामिल हैं) के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है ।
अब जबकि स्कूलों में कक्षा 1 से लेकर कक्षा 12 तक लगातार नामांकन घट रहा है, नामांकन में यह गिरावट सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित समूहों (एसईडीजी) में अधिक है और विशेषकर इन एसईडीजी की महिला विद्यार्थियों के सन्दर्भ में यह और अधिक स्पष्ट है। उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र में एसईडीजी के नामांकन में यह गिरावट और अधिक है | सामाजिक आर्थिक पहचान में आने वाले एसईडीजी की संक्षिप्त स्थिति अनुवर्ती उपखंडों में दी गई है।
  • यू-डीआईएसई 2061-17 के आंकड़ों के अनुसार, प्राथमिक स्तर पर लगभग 19.6% छात्र अनुसूचित जाति के हैं, किन्तु उच्चतर माध्यमिक स्तर यह प्रतिशत कम होकर 17.3% हो गया है। नामांकनों में ये गिरावट अनुसूचित जनजाति के छात्रों (10.6% से 6.8%), और दिव्यांग बच्चों (1.1% से 0.25%) के लिए अधिक गंभीर हैं। इनमें से प्रत्येक श्रेणी में महिला छात्रों के लिए इन नामांकनों में और भी अधिक गिरावट आई है। उच्चतर शिक्षा में नामांकन में गिरावट और भी अधिक है।
  • गुणवत्तापूर्ण स्कूलों तक पहुँच पाने में कमी, गरीबी, सामाजिक रीति-रिवाजों और प्रथाओं और भाषा सहित अनेक विभिन्न कारकों से अनुसूचित जातियों के बीच नामांकन और प्रतिधारण की दरों पर हानिकारक प्रभाव पड़ा है। अनुसूचित जातियों के बच्चों की पहुंच, भागीदारी और अधिगम परिणामों में इन अंतरालों को पूरा करना प्रमुख लक्ष्यों में से एक रहेगा। साथ ही, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) जिन्हें पहले से ही सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े होने के आधार पर पहचाना जाता है, पर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
  • विभिन्न ऐतिहासिक और भौगोलिक कारकों के कारण जनजातीय समुदाय और अनुसूचित जनजातियों के बच्चे भी कई स्तरों पर प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करते हैं। आदिवासी समुदायों के बच्चे अक्सर अपने स्कूली शिक्षा को सांस्कृतिक और शैक्षणिक रूप से अप्रासंगिक और विदेशी पाते हैं। हालांकि वर्तमान में आदिवासी समुदायों के बच्चों के उत्थान के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए जा रहे हैं और आगे भी किए जाते रहेंगे, यह सुनिश्चित करने के लिए विशेष तंत्र बनाए जाने की आवश्यकता है कि जनजातीय समुदायों के बच्चों को इन कार्यक्रमों का लाभ मिले।
  • स्कूल और उच्चतर शिक्षा में अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व भी अपेक्षाकृत कम हैं। यह नीति सभी अल्पसंख्यक समुदायों और विशेष रूप से उन समुदायों के बच्चों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए हस्तक्षेपों के महत्व को स्वीकार करती है, जिनका शैक्षिक रूप से प्रतिनिधित्व कम है।
  • यह नीति विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चों (सीडबल्यूएसएन) या दिव्यांग बच्चों को किसी भी अन्य बच्चे के समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने के समान अवसर प्रदान करने के लिए सक्षम तंत्र बनाने के महत्व को भी पहचानती है।
  • स्कूल शिक्षा में सामाजिक श्रेणी के अंतराल को कम करने पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अलग रणनीति तैयार की जाएगी, जैसा कि निम्नलिखित उप-भागों में उल्लेख किया गया है।
6.3 ईसीसीई, मूलभूत साक्षरता / संख्या ज्ञान और विद्यालय तक पहुँच / नामांकन / उपस्थिति आदि से संबंधित समस्याएं व सिफारिशें जिनकी चर्चा अध्याय । से 3 में की गयी है विशेष रूप से अल्प प्रतिनिधित्व वाले और लाभवज्ञित समूहों के लिए महत्वपूर्ण व प्रासंगिक है। अत: एसईडीजी के सन्दर्भ में अध्याय 1-3 में दिए गए उपायों को दृढ़ता पूर्वक लागू किया जाएगा ।

6.4 इसके अतिरिक्त, लक्षित छात्रवृत्ति, माता-पिता को अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए सशर्त नकद हस्तांतरण, परिवहन के लिए साइकिल प्रदान करना, आदि जैसी विभिन्न सफल नीतियाँ और योजनाएँ चलाई गई हैं जिससे कुछ क्षेत्रों में एसईडीजी की भागीदारी स्कूली शिक्षा प्रणाली में काफी बढ़ी है। इन सफल नीतियों और योजनाओं को पूरे देश में और अधिक सुदृढ़ किया जाना चाहिए।

6.5 यह भी ध्यान में रखना आवश्यक होगा कि यह पता लगाए कि कौन से उपाय विशेष रूप से कुछ एसईडीजी के लिए प्रभावी हैं | उदाहरण के लिए, साइकिल प्रदान करना और स्कूल तक पहुँचने के लिए साइकिल व पैदल चलने वाले समूहों का आयोजन करना महिला छात्रों की बढ़ती भागीदारी के सन्दर्भ में यह विशेष रूप से शक्तिशाली तरीके के रूप में उभरा है - यहाँ तक कि कम दूरी वाले स्थानों पर भी सुरक्षा की दृष्टि से और माता-पिता को मिलने वाले सुरक्षा-भाव के कारण यह काफी प्रभावी तरीका रहा है। दिव्यांग बच्चों की पहुँच सुनिश्चित करने की दृष्टि से एक बच्चे के साथ एक शिक्षक, सहपाठी शिक्षण, मुक्त विद्यालयी शिक्षा, उचित बुनियादी ढांचा और उपयुक्त तकनीक का प्रयोग विशेष रूप से प्रभावी हो सकता हैं। जो विद्यालय गुणवत्तापूर्ण ढंग से बचपन की देखभाल व शिक्षा प्रदान करते हैं वे आर्थिक रूप से वंचित परिवारों से आने वाले बच्चों के लिए विशेष रूप से लाभकारी हैं | इस बीच यह भी देखा गया है कि शहरी गरीब क्षेत्रों में काउंसलर अथवा प्रशिक्षित सामाजिक कार्यकर्ताओं को जो कि छात्रों, अभिवावकों, स्कूलों व शिक्षकों के साथ मिलकर काम करते हैं, को काम पर रखना उपस्थिति, सीखने के परिणामों को बेहतर बनाने की दृष्टि से विशेष रूप से प्रभावी है ।

6.6 आंकड़ों से पता चलता है कि कुछ भौगोलिक क्षेत्रों में एसईडीजी का काफी बड़ा अनुपात है । इसके अलावा, ऐसे भौगोलिक स्थान भी हैं जिनकी पहचान महत्वाकांक्षी जिलों के रूप में की गई है और जिन्हें अपने शैक्षिक विकास को बढ़ावा देने के लिए विशेष हस्तक्षेप की आवश्यकता है | इसलिए, यह सिफारिश की जाती है कि देश के शैक्षिक रूप से वंचित एसईडीजी की बड़ी आबादी वाले कुछ क्षेत्रों को विशेष शिक्षा क्षेत्र (एसईज़ेड) घोषित किया जाना चाहिए, जहाँ केंद्र व राज्यों के द्वारा सही मायने में इन क्षेत्रों के शैक्षिक परिदृश्य को बदलने के लिए अतिरिक्त प्रयासों के माध्यम से उपरोक्त सभी योजनाओं और नीतियों को पूरी तरह से लागू किया जाना चाहिए ।

6.7 हम देख सकते हैं कि अल्पप्रतिनिधित्व वाले सभी समूहों में आधी संख्या महिलाओं की है। दुर्भाग्यवश, एसईडीजी के साथ होने वाले अन्याय का सामना औरों से ज्यादा इन समूहों की महिलाओं को करना पड़ता है । यह नीति समाज में महिलाओं की विशिष्ट और महत्वपूर्ण भूमिका, वर्तमान व भावी पीढ़ियों के आचार - विचार को आकार देने में उनके योगदान को ध्यान में रखते हुए मानती है कि एसईडीजी की लड़कियों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की व्यवस्था उनकी वर्तमान व आने वाली पीढ़ियों के शैक्षिक स्तर को उपर उठाने का सर्वोत्तम तरीका होगा । अत: नीति इस बात की सिफारिश करती है एसईडीजी विद्यार्थियों के उत्थान के लिए बनायीं जा रही नीतियों और योजनाओं को विशेष रूप से इन समूहों की बालिकाओं पर केन्द्रित होना चाहिए ।

6.8 इसके अलावा, भारत सरकार सभी लड़कियों और साथ ही ट्रांसजेंडर छात्रों को गुणवत्तापूर्ण और न्यायसंगत शिक्षा प्रदान करने की दिशा में देश की क्षमता का विकास करने हेतु एक 'जेंडर-समावेशी निधि' का गठन करेगी । केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित प्राथमिकताओं को लागू करने के लिए राज्यों को यह सुविधा उपलब्ध कराने के लिए एक कोष उपलब्ध होगा । महिला और ट्रांसजेंडर बच्चों तक शिक्षा की पहुँच सुनिश्चित करने की दृष्टि से यह प्रावधान बेहद महत्वपूर्ण है (जैसे स्वच्छता व शौचालय से संबंधित सुविधाएं, साइकिल व सशर्त नकद हस्तांतरण, आदि); यह कोष राज्यों को समुदाय आधारित कार्यक्रमों को प्रभावी बनाने व और उसे बड़े स्तर तक ले जाने में सक्षम बनाएगा जो महिला व ट्रांस जेंडर बच्चों तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की पहुँच सुनिश्चित करने की दिशा में परिस्थितिजन्य समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करेगा। अन्य एसईडीजी की शिक्षा तक पहुँच से सम्बंधित समान समस्याओं के समाधान हेतु इसी प्रकार की 'समावेशी निधि' की व्यवस्था की जायेगी । संक्षेप में, इस नीति का उद्देश्य किसी भी लिंग या अन्य सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित समूह के बच्चों के लिए शिक्षा (व्यावसायिक शिक्षा समेत) तक पहुँच में शेष असमानता को समाप्त करना है ।

6.9 ऐसे स्थान जहाँ विद्यालय तक आने के लिए छात्रों को अधिक दूरी तय करनी पड़ती है वहाँ जवाहर नवोदय विद्यालयों के स्तर की तर्ज पर निशुल्क छात्रावासों का निर्माण किया जाएगा। विशेषकर ऐसे बच्चों के लिए जो सामाजिक - आर्थिक रूप से वंचित पृष्ठभूमि से आते हैं | इन छात्रावासों में सभी बच्चों विशेषकर लड़कियों की सुरक्षा की उपयुक्त व्यवस्था की जायेगी । कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालयों को और मजबूत बनाया जाएगा तथा सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े समूहों की बालिकाओं की गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा वाले विद्यालयों (ग्रेड 12 तक) में प्रतिभागिता बढ़ाने की दृष्टि से इन्हें और अधिक विस्तारित किया जाएगा । भारत के हर कोने में उच्चतर गुणवत्ता की शिक्षा के अवसर प्रदान करने की दृष्टि से विशेषकर आवकंक्षात्मक जिलों, विशेष शिक्षा क्षेत्रों व वंचित क्षेत्रों में अतिरिक्त जवाहर नवोदय विद्यालय व केंद्रीय विद्यालय खोले जायेंगे | कम से कम एक वर्ष की प्रारम्भिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा को समाहित करते हुए केंद्रीय विद्यालयों में व देश के अन्य प्राथमिक विद्यालयों में विशेषकर वंचित क्षेत्रों में प्री -स्कूल वर्ग को जोड़ा जाएगा।

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