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समग्र और बहु-विषयक शिक्षा की ओर

समग्र और बहु-विषयक शिक्षा की ओर

11.1 भारत में समग्र एवं बहु-विषयक तरीके से सीखने की एक प्राचीन परंपरा है, तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों से लेकर ऐसे कई व्यापक साहित्य हैं जो विभिन्न क्षेत्रों में विषयों के संयोजन को प्रकट करते हैं। प्राचीन भारतीय साहित्य जैसे बाणभट्ट की कादंबरी शिक्षा को 64 कलाओं के ज्ञान के रूप में परिभाषित / वर्णित करती है; और इन 64 कलाओं में न केवल गायन और चित्रकला जैसे विषय शामिल हैं, बल्कि वैज्ञानिक क्षेत्र जैसे रसायनशास्त्र और गणित, व्यावसायिक क्षेत्र जैसे बढ़ई का काम और कपड़े सिलने का कार्य, व्यावसायिक कार्य जैसे औषधि तथा अभियांत्रिकी और साथ ही साथ सम्प्रेषण, चर्चा और वाद-संवाद करने के व्यवहारिक कौशल (सॉफ्ट स्किल्स) भी शामिल हैं। यह विचार कि इंसानी सृजन के सभी क्षेत्र (जिसमें गणित, विज्ञानं, पेशेवर और व्यावसायिक विषय और व्यवहारिक कौशल शामिल हैं) को 'कलाओं' के रूप में देखा जाना चाहिए, भारतीय चिंतन की देन है। विभिन्न 'कलाओं के ज्ञान के इस विचार, या जैसा कि आधुनिक युग में जिसे 'लिबरल आर्ट्स (कलाओं का एक उदार नजरिया)' कहा जाता है, को भारतीय शिक्षा में पुन शामिल करना ही होगा, चूँकि यह वही शिक्षा है जिसकी 21वीं शताब्दी में आवश्यकता होगी।

11.2 आकलन से पता चलता है की, स्नातक शिक्षा के दौरान, ऐसी शैक्षणिक पद्धतियाँ जो एसटीईएम (विज्ञान, तकनीकी, अभियांत्रिकी और गणित) के साथ मानविकी और कला शिक्षा को समाहित करती हैं, तो रचनात्मकता और नवाचार, आलोचनात्मक चिंतन एवं उच्चतर स्तरीय चिंतन की क्षमता, समस्या समाधान योग्यता, समूह कार्य में दक्षता, सम्प्रेषण कौशल, सीखने में गहराई और पाठ्यक्रम के सभी विषयों पर पकड़, सामाजिक और नैतिकता के प्रति जागरूकता आदि जैसे सकारात्मक शैक्षणिक परिणाम प्राप्त हुए हैं और साथ ही, समग्र और बहु-विषयक शिक्षा दृष्टिकोण के माध्यम से अनुसंधान में भी सुधार और बढ़ोत्तरी हुई है।

11.3 एक समग्र और बहु-विषयक शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य की सभी क्षमताओं- बौद्धिक, सौन्दर्यात्मक, सामाजिक, शारीरिक, भावात्मक तथा नैतिक- को एकीकृत तरीके से विकसित करना होगा। ऐसी शिक्षा व्यक्ति के सर्वागीण विकास: कला, मानविकी, भाषा, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, और व्यावसायिक, तकनीकी और व्यावसायिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण 21 वीं सदी की क्षमता; सामाजिक जुड़ाव की नैतिकता; व्यवहारिक कौशल (सॉफ्ट स्किल्स), जैसे सम्प्रेषण, चर्चा, वाद-विवाद; और एक चुने हुए क्षेत्र या क्षेत्रों में अच्छी विशेषज्ञता में मदद करेगी। इस तरह की एक समग्र शिक्षा, लंबे समय तक व्यावसायिक, तकनीकी और पेशेवर विषयों सहित सभी स्नातक कार्यक्रमों का दृष्टिकोण होगा।

11.4 एक समग्र और बहु-विषयक शिक्षा, जो कि भारत के इतिहास में सुन्दर ढंग से वर्णित की गई है - वास्तव में आज के स्कूलों की जरूरत है, ताकि हम इक्कीसवीं शताब्दी और चौथी औद्योगिक क्रांति का नेतृत्व कर सकें। यहाँ तक कि अभियांत्रिकी संस्थान जैसे आई. आई. टी, कला और मानविकी के साथ समग्र और बहु-विषयक शिक्षा की ओर बढ़ेंगे। कला एवं मानविकी के छात्र भी विज्ञान सीखेंगे, कोशिश यही होगी की सभी व्यावसायिक विषय और व्यवहारिक कौशलों (सॉफ्ट स्किल्स) को हासिल करें। कला, विज्ञान और अच्यक्षेत्रों में भारत की खास विरासत इस तरह की शिक्षा की ओर बढ़ने में सहायक होगी।
 
11.5 कल्पनाशील और लचीली पाठ्यक्रम संरचनाएं अध्ययन के लिए विषयों के रचनात्मक संयोजन को सक्षम करेंगी, और कई प्रवेश और निकास बिन्दुओं के विकल्प होंगे। इस तरह से आज की कठोर अनुशासनात्मक सीमाओं को हटाकर आजीवन सीखने की संभावनाओं को बढ़ावा मिलेगा। बड़े बहु- विषयक विश्वविद्यालयों में स्नातक स्तर (मास्टर और डॉक्टरेट) की शिक्षा, कठोर अनुसंधान-आधारित विशेषज्ञता प्रदान करने के साथ-साथ अकादमिक (शिक्षा जगत), सरकार और उद्योग सहित, बहु-विषयक कार्यों के अवसर भी प्रदान करेगा।

11.6 बड़े बहु-विषयक विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में उच्चतर-गुणवत्ता की समग्र और बहु-विषयक शिक्षा की दिशा में कदम बढ़ाए जाएंगे। विषयों में कठोर विशेषज्ञता के अलावा, छात्रों को पाठ्यचर्या में लचीलापन, नए और रोचक कोर्सस के विकल्प दिए जाएंगे। पाठ्यक्रम निर्धारित करने में संकाय और संस्थागत स्वायत्तता द्वारा इसे प्रोत्साहित किया जाएगा। शिक्षाशास्त्र में संचार, चर्चा, बहस, अनुसंधान और क्रॉस-डिसिप्लिनरी और अंतःविषयक सोच के अवसरों पर अधिक जोर होगा।

11.7 देश के विभिन्न उच्चतर शिक्षा संस्थानों (एचईआई) में भाषा, साहित्य, संगीत, दर्शन, भारत-विद्या, कला, नृत्य, नाट्यकला, शिक्षा, गणित, सांख्यिकी, सैद्धांतिक तथा व्यावहारिक विज्ञान, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, खेल, अनुवाद एवं व्याख्या और अन्य ऐसे विषयों के विभागों को बहु-विषयक, भारतीय शिक्षा और वातावरण को प्रोत्साहित करने के लिए स्थापित और मज़बूत किया जाएगा। इन विषयों में सभी स्नातक उपाधि कार्यक्रमों में क्रेडिट दिया जाएगा यदि वे ऐसे विभागों से या ओडीएल मोड के माध्यम से किए जाते हैं, जब उन्हें एचईआई की कक्षाओं में उपलब्ध नहीं कराया जाता है।

11.8 ऐसी समग्र और बहु-विषयक शिक्षा के विचार को धरातल पर लाने के लिए, सभी एचईआई के लचीले और नवीन पाठ्यक्रम में क्रेडिट आधारित पाठ्यक्रम और सामुदायिक जुड़ाव और सेवा, पर्यावरण शिक्षा, और मूल्य-आधारित शिक्षा के क्षेत्र शामिल होंगे। पर्यावरण शिक्षा में जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, अपशिष्ट प्रबंधन, स्वच्छता, जैविक विविधता का संरक्षण, जैविक संसाधनों का प्रबंधन और जैव विविधता, वन और वन्यजीव संरक्षण, और सतत विकास तथा रहने जैसे क्षेत्र शामिल होंगे। मूल्य आधारित शिक्षा में निम्न शामिल हैं: मानवीय, नैतिक, संवैधानिक तथा सार्वभौमिक मानवीय मूल्य जैसे सत्य, नेक आचरण (dharma), शांति, प्रेम, अहिंसा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, नागरिक मूल्य और जीवन- कौशल; सेवा तथा सामुदायिक कार्यक्रमों में सहभागिता समग्र शिक्षा का अभिन्न अंग होगा। जैसे-जैसे दुनिया तेजी से आपस में जुड़ती जा रही है, वैश्विक नागरिक शिक्षा (जीसीईडी), समकालीन वैश्विक चुनौतियों की प्रतिक्रिया, शिक्षार्थियों को वैश्विक मुद्दों को समझने और अधिक शांतिपूर्ण, सहिष्णु, समावेशी, सुरक्षित और सतत समाज के सक्रिय प्रवर्तक बनने के लिए प्रदान की जाएगी। अंतत: समग्र शिक्षा के अंतर्गत, उच्चतर शिक्षा संस्थान अपने ही संस्थानों में या अन्य उच्चतर शिक्षा / शोध संस्थानों में इंटर्नशिप के अवसर उपलब्ध
कराएंगे, जैसे- स्थानीय उद्योग, व्यवसाय, कलाकार, शिल्पकार आदि के साथ इंटर्नशिप और अध्यापकों और शोधार्थियों के साथ, शोध इंटर्नशिप ताकि छात्र सक्रिय रूप से अपने सीखने के व्यावहारिक पक्ष के साथ जुड़ें और साथ ही साथ, स्वयं के रोज़गार की संभावनाओं को भी बढ़ा सकें।

डिग्री कार्यक्रमों की अवधि और संरचना में बदलाव

11.9 डिग्री कार्यक्रमों की अवधि और संरचना में तदनुसार बदलाव किया जाएगा। स्नातक उपाधि 3 या 4 वर्ष की अवधि की होगी, जिसमे उपयुक्त प्रमाणपत्र के साथ निकास के कई विकल्प होंगे। उदाहरण के तौर पर, व्यावसायिक तथा पेशेवर क्षेत्र सहित किसी भी विषय अथवा क्षेत्र में 1 साल पूरा करने पर सर्टिफिकेट या 2 साल पूरा करने पर डिप्लोमा या 3 साल के कार्यक्रम के बाद स्नातक की डिग्री4 वर्षीय स्नातक प्रोग्राम, जिसमें बहु-विषयक शिक्षा को बढ़ावा दिया जाएगा, क्योंकि इस दौरान यह विद्यार्थी की रूचि के अनुसार चुने हुए मेजर और माइनर पर ध्यान केंद्रित करने के अलावा समग्र तथा बहु-विषयक शिक्षा का अनुभव लेने के अवसर प्रदान करता है। एक अकादेमिक क्रेडिट बैंक (एबीसी) स्थापित किया जाएगा जो अलग-अलग मान्यता प्राप्त उच्चतर शिक्षण संस्थानों से प्राप्त क्रेडिट को डिजिटल रूप से संकलित करेगा ताकि प्राप्त क्रेडिट के आधार पर उच्चतर शिक्षण संस्थान द्वारा डिग्री दी जा सके। यदि छात्र एचईआई द्वारा निर्दिष्ट अध्ययन के अपने प्रमुख क्षेत्र (क्षेत्रों) में एक कठोर शोध परियोजना को पूरा करता है तो उसे 4 वर्षीय कार्यक्रम में 'शोध सहित' डिग्री भी दी जा सकती है ।

11.10 उच्चतर शिक्षण संस्थानों (एचईआई) को विभिन्न प्रारूपों में स्नातकोत्तर कार्यक्रमों को मुहैया कराने की छूट होगी :- 
  • ऐसे विद्यार्थियों के लिए जिन्होंने 3 साल का स्नातक कार्यक्रम पूरा किया हो, उन्हें 2 वर्षीय कार्यक्रम प्रदान किए जा सकते हैं जिसमें द्वितीय वर्ष पूरी तरह से शोध पर केन्द्रित हो; 
  • वे विद्यार्थी जिन्होंने 4 वर्ष का स्नातक कार्यक्रम शोध के साथ पूरा किया है, उनके लिए एक वर्ष का स्नातकोत्तर कार्यक्रम हो सकता है; और 
  • 5 वर्षों का एक एकीकृत स्नातक/स्रातकोत्तर कार्यक्रम हो सकता है। पीएच-डी के लिए या तो स्नातकोत्तर डिग्री या 4 वर्षों के शोध के साथ प्राप्त स्नातक डिग्री अनिवार्य होगी। एम.फिल कार्यक्रम को बंद कर दिया जाएगा।
11.11 समग्र और बहु-विषयक शिक्षा के लिए आई.आई.टी., आई.आई.एम. आदि की तर्ज पर, मेरू (बहु-विषयक शिक्षा और शोध विश्वविद्यालय) नामक मॉडल सार्वजनिक विश्वविद्यालयों की स्थापना की जाएगी। इन विश्वविद्यालयों का उद्देश्य, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में उच्चतमवैश्विक मानकों को अर्जित करना होगा। ये देश भर में बहु-विषयक शिक्षा के उच्चतम मानक भी स्थापित करेंगे।

11.12 उच्चतर शिक्षण संस्थान स्टार्ट-अप, इन्क्यूबेशन सेंटर, प्रौद्योगिकी विकास केंद्र, अनुसंधान के प्रमुख क्षेत्रों के केंद्र, अधिकतम उद्योग-अकादेमिक जुड़ाव, और मानविकी और सामाजिक विज्ञान अनुसंधान सहित अंतर-विषय अनुसंधान की स्थापना करके अनुसंधान और नवाचार पर फोकस करेंगे। संक्रामक रोगों और वैश्विक महामारियों के परिदृश्य को देखते हुए, यह महत्वपूर्ण है कि उच्चतर शैक्षणिक संस्थान, संक्रामक रोगों, महामारी विज्ञान, वायरोलॉजी, डायग्रोस्टिक्स, इंस्ट्रूमेंटेशन, वैक्सीनोलॉजी और अन्य प्रासंगिक क्षेत्रों में अनुसंधान करने की अगुवाई करे। छात्र समुदाय के बीच नवाचार को बढ़ावा देने के लिए उच्चतर शिक्षण संस्थान विशिष्ट हैंडहोल्डिंग तंत्र विकसित करेगा। एनआरएफ, उच्चतर शिक्षण संस्थानों अनुसंधान प्रयोगशालाओं, और अन्य अनुसंधान संगठनों में इस तरह के एक जीवंत अनुसंधान और नवाचार संस्कृति को सक्षम करने और समर्थन करने में मदद करने के लिए कार्य करेगा।

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