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क्रियान्वयन की रणनीति

केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड का सशक्तिकरण

25.1 इस नीति के सफल क्रियान्वयन के लिए राष्ट्रीय, राज्य, संस्थागत और व्यक्तिगत स्तर पर एक दीर्घकालिक विज़न, विशेषज्ञता की निरंतर उपलब्धता और संबंधित लोगों द्वारा ठोस कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। इस संदर्भ में, यह नीति केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड (CEAB) के सशक्तिकरण की अनुशंसा करती है जो कि ना केवल शैक्षिक एवं सांस्कृतिक विकास से जुड़े मुद्दों पर व्यापक परामर्श और समीक्षा के लिए एक फोरम प्रदान करता हैं बल्कि इसके कहीं अधिक वृहद्‌ उद्देश्य हैं। एक पुनर्कल्पित और पुनर्जीवित केब (CEAB) मानव संसाधन विकास मंत्रालय और राज्य स्तर पर सदृश इकाइयों/निकायों के साथ मिलकर देश में शिक्षा के विज़न को लगातार अनवरत रूप से विकसित करने, सुस्पष्टता लाने, उसका आंकलन करने और उसको संशोधित करने के लिए ज़िम्मेदार होगा । इसे ऐसी संस्थागत रूपरेखाओं को भी लगातार तैयार एवं उनकी समीक्षा करते रहना चाहिए जो इस विज़न को प्राप्त करने में सहायक होंगी।

25.2 अधिगम और शिक्षा पर एक बार फिर ध्यान केन्द्रित करने के लिए यह वांछनीय होगा कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय को शिक्षा मंत्रालय(एमओई) के रूप में पुन-नामित किया जाए।

वित्त पोषण: सभी के लिए वहनीय एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा

26.1 यह नीति शैक्षिक निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि के लिए प्रतिबद्ध है क्यूंकि समाज के भविष्य हेतु युवाओं के लिए उच्चतर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से बेहतर कोई निवेश नहीं होता। दुर्भाग्य से भारत में शिक्षा पर होने वाला सार्वजनिक व्यय कभी भी सरकारी खर्च कभी भी कुल सकल घरेलू उत्पाद के 6% तक नहीं पहुँच पाया जिसकि 1968 की शिक्षा नीति में अनुशंसा कि गयी थी और जिसको 1986 की शिक्षा नीति और 1992 में नीति समीक्षा में दोहराया गया था। वर्तमान में शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च (केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा) जीडीपी (बजटीय व्यय आवंटन 2017-18 के विश्लेषण के अनुसार) के 4.43% के आस पास है और सरकारी व्यय का केवल 10% शिक्षा पर किया जाता है (इकनोमिक सर्वे 2017-18), यह आंकड़ा अधिकाँश शिक्षित एवं विकासशील देशों से काफी कम है।

26.2 भारत में उत्कृष्टता के साथ शिक्षा के लक्ष्य को पाने के लिए तथा देश एवं अर्थव्यवस्था के लिए से जुड़े लाभों की बहुलता के कारण यह शिक्षा नीति, केंद्र तथा सभी राज्य सरकारों द्वारा, शिक्षा में निवेश को पर्याप्त रूप से बढ़ाने का समर्थन करती है । केंद्र और राज्य शिक्षा क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश को बढ़ाने के लिए जीडीपी के 6% तक जल्द से जल्द पहुँचने के लिए मिलकर काम करेंगे। भारत के भावी आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक एवं तकनीकी उन्नति एवं विकास के लिए ज़रूरी, उच्चतर गुणवत्तापूर्ण एवं समतापूर्ण सरकारी शिक्षा व्यवस्था के लिए शिक्षा पर इतना निवेश करना बहुत ही महत्वपूर्ण है।

26.3 विशेष रूप से शिक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मदों और संघटकों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी जैसे- सभी तक शिक्षा की पहुँच सुनिश्चित करना, सीखने के संसाधन, पोषण सहायता, विद्यार्थियों की सुरक्षा एवं स्वास्थ्य, शिक्षकों एवं कर्मचारियों की पर्याप्त संख्या, शिक्षकों का विकास तथा पिछड़े और सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े समूहों के लिए समतापूर्ण उच्चतर गुणवत्ता की शिक्षा प्रदान करने के लिए किये जाने वाले सभी प्रुमख प्रयास।

26.4 मुख्यतः बुनियादी सुविधाओं एवं संसाधन सम्बन्धी एकमुश्त खर्चों के अलावा यह नीति एक शिक्षा प्रणाली विकसित करने के लिए वित्त पोषण हेतु निम्नलिखित महत्वपूर्ण दीर्घकालिक क्षेत्रों की पहचान करती है, जिन पर जोर दिया जाना चाहिए:
  • गुणवत्तापूर्ण प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल शिक्षा का सार्वभौमिक प्रावधान; 
  • पढ़ने लिखने और गणना करने की बुनियादी क्षमता सुनिश्चित करना, 
  • सभी स्कूल काप्प्लेक्सों/क्लस्टरों के लिए पर्याप्त और उपयुक्त संसाधन, 
  • भोजन एवं पोषण मुहैय्या कराना(नाश्ता एवं मध्याहन भोजन), 
  • शिक्षक शिक्षा और शिक्षकों के सतत व्यावसायिक विकास में निवेश, 
  • उत्कृष्टता को पोषित करने के लिए विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में सुधार, 
  • शोध का विकास और 
  • प्रौद्योगिकी और ऑनलाइन शिक्षा का व्यापक उपयोग।
26.5 शिक्षा के क्षेत्र के लिए सीमित मात्रा में उपलब्ध वित्त भी अमूमन जिला/संस्थान के स्तर पर समय पर व्यय नहीं किया जाता, जिससे उस राशि के लक्षित उद्देश्यों को प्राप्त करने में कठिनाई होती है। अतः आवश्यकता उपयुक्त नीतिगत परिवर्तनों द्वारा उपलब्ध बजट के उपयोग में दक्षता बढ़ाने की है। वित्तीय प्रशासन एवं प्रबंधन इस बात पर ध्यान देगा कि निधियाँ आसानी से, समय पर एवं उचित मात्रा में उपलब्ध हों और उसका व्यय ईमानदारी से किया जाए। प्रशासनिक प्रक्रियाओं को संशोधित और सुव्यवस्थित किया जाएगा ताकि संवितरण तंत्र के कारण अधिक मात्रा में अव्ययित शेष न रह सके। सरकारी संसाधनों के कुशल उपयोग और धन की पार्किंग से बचने के लिए जीएफआर, पीएफएमएस एवं 'सही समय पर' आवंटन से संबंधित प्रावधान को लागू करने वाली कार्यान्वयन एजेंसियों के लिए जारी किया जाएगा। राज्य /उच्चतर शिक्षा संस्थानों में प्रदर्शन-आधारित वित्त पोषण का तंत्र तैयार किया जा सकता है। इसी प्रकार एसईडीजी के लिए निर्धारित धन के इष्टतम आवंटन और उपयोग के लिए कुशल तंत्र सुनिश्चित किया जाएगा। प्रस्तावित नवीन नियामक व्यवस्था, जिसमें भूमिकाओं का विभाजन एवं पारदर्शी स्व-प्रकटीकरण, संस्थानों का सशक्तिकरण एवं स्वायत्तता, उत्कृष्ट एवं योग्य विशेषज्ञों की प्रमुख पदों पर नियुक्तिआदि
शामिल है, से वित्त के आसान, त्वरित एवं पारदर्शी प्रवाह में मदद मिलेगी।

26.6 यह नीति शिक्षा क्षेत्र में निज़ी परोपकारी गतिविधिओं को पुनर्जीवित करने, सक्रिय रूप से प्रोत्साहित करने और समर्थन करने की अनुशंसा करती है। विशेष रूप से, बजटीय समर्थन के अतिरिक्त जो अन्यथा उन्हें प्रदान किया गया होता है। कोई भी सार्वजनिक संस्थान शैक्षिक अनुभवों को बढ़ाने के लिए निजी परोपकारी धन जुटाने की दिशा में पहल कर सकता है।

26.7 इस नीति में शिक्षा के व्यावसायीकरण के मुद्दे से कई मोर्चों पर निपटने का प्रयास किया गया है, जिसमें 'सरल किन्तु कठोर' नियमन दृष्टिकोण भी शामिल है, जो विक्त, प्रक्रियाओं, कार्यपद्धति, उपलब्ध पाठ्यक्रमों एवं कार्यक्रमों में पूरी पारदर्शिता के साथ स्व-प्रकटीकरण; सार्वजनिक शिक्षा में पर्याप्त निवेश, सरकारी तथा निजी सभी संस्थानों में अच्छे प्रशासन और तंत्र पर जोर देता है। इसी तरह, जरूरतमंद अथवा योग्य वर्गों को प्रभावित किए बिना उच्चतर लागत वसूली के अवसरों का भी पता लगाया जाएगा।

क्रियान्वयन

27.1 किसी भी नीति की प्रभावशीलता उसके कार्यान्वयन पर निर्भर करती है। ऐसे क्रियान्वयन के लिए, कई निकायों द्वारा समन्वित एवं व्यवस्थित तरीके से बहुत सी पहल करनी होंगी और कई कदम उठाने की ज़रूरत होगी। इसलिए इस नीति के क्रियान्वयन को कई निकायों, जिनमें एमएचआरडी, केब, केंद्र एवं राज्य सरकारें, शिक्षा सम्बन्धी मंत्रालय, राज्यों के शिक्षा विभाग, बोर्ड्स, एनटीए, स्कूल एवं उच्चतर शिक्षा के नियामक निकाय, एनसीईआरटी, एससीईआरटी, स्कूल एवं उच्चतर शिक्षण संस्थान शामिल हैं, द्वारा शिक्षा में शामिल सभी निकायों में योजना को लेकर आपसी समन्वयन व तालमेल के माध्यम से इसके भाव एवम प्रयोजन अनुसार सुनिश्चित करने के लिए नेतृत्व प्रदान किया जायेगा।

27.2 क्रियान्वयन के लिए निम्नलिखित मार्गदर्शी सिद्धांत होंगे : 
  • नीति की भावना और प्रयोजन क्रियान्वयन हेतु सबसे महत्वपूर्ण पहलू हैं। 
  • नीतिगत पहलों को चरणबद्ध तरीके से क्रियान्वित करना महत्वपूर्ण है क्योंकि नीति के हर बिंदु में कई कदम हैं और प्रत्येक चरण इस दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है क्योंकि वह अगले चरण के क्रियान्वयन का आधार बनता है।
  • प्राथमिकीकरण द्वारा काम को एक ऐसे क्रमबद्ध तरीके से किया जाना संभव होगा जिसमें सबसे महत्वपूर्ण और अति-आवश्यक कार्य पहले किए जाएँ ताकि एक मजबूत नींव तैयार हो सके। 
  • क्रियान्वयन की व्यापकता महत्वपूर्ण होगी; यह नीति एक व्यापक नज़रिया, समग्रता रखती है जिसके अवयव आपस में जुड़े हुए हैं, अतः टुकड़ों में प्रयास करने के बजाय समग्र दृष्टिकोण रखते हुए क्रियान्वयन करने से ही वांछित उद्देश्यों की प्राप्ति सुनिश्चित होगी। 
  • क्योंकि शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है, अतः इसमें केंद्र और राज्यों के बीच सावधानीपूर्वक योजना निर्माण, संयुक्त निगरानी और समन्वयपूर्ण क्रियान्वयन की जरुरत होगी। 
  • संतोषजनक निष्पादन के लिए मानव, संरचनागत और वित्तीय संसाधनों को समय से जुटाना अहम बिंदु है। 
  • क्रियान्वयन हेतु किए जाने वाले विविध उपायों के बीच परस्पर जुड़ाव का सावधानीपूर्वक विश्लेषण और समीक्षा सभी पहलों के एक-दूसरे से प्रभावी जुड़ाव को सुनिश्चित करने की दृष्टि से जरुरी होगी। 
इसमें कुछ ऐसे कार्यों में निवेश शामिल है (उदाहरण के लिए प्रारम्भिक बाल्यावस्था शिक्षा का बुनियादी ढाँचा)जो ना सिर्फ एक मजबूत नींव बनाने की दृष्टि से जरुरी हैं बल्कि भावी कार्यक्रमों और कार्यों के बाधारहित संचालन के लिए भी आवश्यक हैं।

27.3 सम्बद्ध मंत्रालयों के समन्वय से एवं उनसे परामर्श करके केंद्र एवं राज्य दोनों स्तरों पर विषयवार क्रियान्वयन विशेषज्ञ समितियों का गठन किया जाएगा जो इस नीति के उद्देश्यों को चरणबद्ध और स्पष्ट रूप से प्राप्त करने के लिए उपरोक्त सिद्धांतो के अनुसार एक विस्तृत क्रियान्वयन योजना तैयार करेंगीं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय और राज्यों द्वारा निर्दिष्ट टीमों के द्वारा प्रत्येक क्रियान्वयन बिंदु के लिए रखे गए लक्ष्यों के अनुसार नीति की प्रति वर्ष संयुक्त समीक्षा की जायेगी और केब के साथ साझा की जाएगी। 2030-40 के दशक तक सम्पूर्ण नीति क्रियान्वयन अवस्था में आ चुकी होगी और उसके बाद एक और व्यापक समीक्षा की जाएगी।


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