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स्कूलों में पाठ्यक्रम और शिक्षण-शास्त्र : बहुभाषावाद और भाषा की शक्ति

बहुभाषावाद और भाषा की शक्ति

शिक्षा नीति 2020 अध्याय 4 भाग 2

4.11 यह सर्वविदित है कि छोटे बच्चे अपनी घर की भाषा / मातृभाषा में सार्थक अवधारणाओं को अधिक तेजी से सीखते हैं और समझ लेते हैं। घर की भाषा आमतौर पर मातृभाषा या स्थानीय समुदायों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। हालांकि, कई बार बहुभाषी परिवारों में, परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा बोली जाने वाली एक घरेलू भाषा हो सकती है, जो कभी-कभी मातृभाषा या स्थानीय भाषा से भिन्न हो सकती है।

जहाँ तक संभव हो, कम से कम ग्रेड 5 तक लेकिन बेहतर यह होगा कि यह ग्रेड 8 और उससे आगे तक भी हो, शिक्षा का माध्यम, घर की भाषा / मातृभाषा / स्थानीय भाषा / क्षेत्रीय भाषा होगी। इसके बाद, घर / स्थानीय भाषा को जहाँ भी संभव हो भाषा के रूप में पढ़ाया जाता रहेगा। सार्वजनिक और निजी दोनों तरह के स्कूल इसकी अनुपालना करेंगे। विज्ञान सहित सभी विषयों में उच्चतर गुणवत्ता वाली पाठ्यपुस्तकों को घरेलू भाषाओं/मातृ-भाषा में उपलब्ध कराया जाएगा।

यह सुनिश्चित करने के लिए सभी प्रयास जल्दी किए जाएंगे कि बच्चे द्वारा बोली जाने वाली भाषा और शिक्षण के माध्यम के बीच यदि कोई अंतराल मौजूद हो तो उसे समाप्त किया जा सके। ऐसे मामलों में जहाँ घर की भाषा की पाठ्य-सामग्री उपलब्ध नहीं है, शिक्षकों और छात्रों के बीच संवाद की भाषा भी जहाँ संभव हो, वहाँ घर की भाषा बनी रहेगी। शिक्षकों को उन छात्रों के साथ जिनके घर की भाषा/मातृ-भाषा शिक्षा के माध्यम से भिन्न है, द्विभाषी शिक्षण-अधिगम सामग्री सहित द्विभाषी एप्रोच का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। सभी भाषाओं को सभी छात्रों को उच्चतर गुणवत्ता के साथ पढ़ाया जाएगा; एक भाषा को अच्छी तरह से सिखाने और सीखने के लिए इसे शिक्षा का माध्यम होने की आवश्यकता नहीं है।

4.12 जैसा कि अनुसंधान स्पष्ट रूप से दिखातें हैं कि बच्चे 2 और 8 वर्ष की आयु के बीच बहुत जल्दी भाषा सीखते हैं और बहुभाषिकता से इस उम्र के विद्यार्थियों को बहुत अधिक संज्ञानात्मक लाभ होता है, फाउंडेशनल स्टेज की शुरुआत और इसके बाद से ही बच्चों को विभिन्न भाषाओं में (लेकिन मातृभाषा पर विशेष जोर देने के साथ) एक्सपोज़र दिए जाएंगे। सभी भाषाओं को एक मनोरंजक और संवादात्मक शैली में पढ़ाया जाएगा, जिसमें बहुत सारी संवादात्मक बातचीत होगी, और शुरुआती वर्षों में पढ़ने और बाद में मातृभाषा में लिखने के साथ - ग्रेड 3 और आगे की कक्षाओं में अन्य भाषाओं में पढ़ने और लिखने के लिए कौशल विकसित किये जाएंगे।

केंद्र और राज्य दोनों सरकारों की ओर से देश भर की सभी क्षेत्रीय भाषाओं, और विशेष रूप संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्णित सभी भाषाओं में बड़ी संख्या में भाषा शिक्षकों में निवेश का एक बड़ा प्रयास होगा। राज्य, विशेष रूप से भारत के विभिन्न क्षेत्रों के राज्य, अपने-अपने राज्यों में त्रि-भाषा फार्मूले को अपनाने के लिए, और साथ ही देश भर में भारतीय भाषाओं के अध्ययन को प्रोत्साहित करने के लिए बड़ी संख्या में शिक्षकों को नियुक्त करने के लिए आपस में द्वि-पक्षीय समझौते कर सकते हैं। विभिन्न भाषाओं को सीखने के लिए और भाषा शिक्षण को लोकप्रिय बनाने के लिए तकनीक का बृहद उपयोग किया जायेगा।

त्रि-भाषा फार्मूला (हिंदी,अंग्रेजी और मातृभाषा)

4.13 संवैधानिक प्रावधानों, लोगों, क्षेत्रों और संघ की आकांक्षाओं और बहुभाषावाद और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने की ज़रूरत का ध्यान रखते हुए त्रि-भाषा फॉर्मूले को लागू किया जाना जारी रहेगा। हालाँकि, तीन-भाषा के इस फ़ॉर्मूले में काफी लचीलापन रखा जाएगा और किसी भी राज्य पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी। बच्चों द्वारा सीखी जाने वाली तीन भाषाओं के विकल्प राज्यों, क्षेत्रों, और निश्चित रूप से छात्रों के स्वयं के होंगे, जिनमें से कम से कम तीन में दो भाषाएँ भारतीय भाषाएँ हों। विशेष रूप से, जो छात्र तीन में से एक या अधिक भाषाओं को बदलना चाहते हैं, वे ऐसा ग्रेड 6 या 7 में कर सकते हैं लेकिन ऐसा करने के लिए उन्हें तीनों भाषा में, जिसमें एक भारतीय भाषा को उसके साहित्य के स्तर पर अध्ययन करना शामिल है, माध्यमिक कक्षाओं के अंत तक बुनियादी दक्षता हासिल करके दिखाना होगा।

4.14 इस संबंध में, उच्चतर गुणवत्ता वाली विज्ञान और गणित में द्विभाषी पाठ्यपुस्तकों और शिक्षण-अधिगम सामग्री को तैयार करने के सभी प्रयास किए जाएंगे ताकि विद्यार्थी दोनों विषयों पर सोचने और बोलने के लिए अपने घर की भाषा/मातृभाषा और अंग्रेजी दोनों में सक्षम हो सकें।

4.15 जैसा कि दुनिया भर के कई विकसित देशों में यह देखने को मिलता है कि अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं में शिक्षित होना कोई बाधा नहीं है, बल्कि वास्तव में शैक्षिक, सामाजिक और तकनीकी प्रगति के लिए इसका बहुत बड़ा लाभ ही होता है। भारत की भाषाएं दुनिया में सबसे समृद्ध, सबसे वैज्ञानिक, सबसे सुंदर और सबसे अधिक अभिव्यंजक भाषा में से हैं, जिनमें प्राचीन और आधुनिक साहित्य (गद्य और कविता दोनों) के विशाल भंडार हैं। इन भाषा में लिखी गयी फिल्म, संगीत और साहित्य भारत की राष्ट्रीय पहचान और धरोहर हैं। सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकीकरण की दृष्टि से सभी युवा भारतीयों को अपने देश की भाषाओं के विशाल और समृद्ध भण्डार और इनके साहित्य के खज़ाने के बारे में जागरूक होना चाहिए।

4.16 इस प्रकार देश में प्रत्येक विद्यार्थी पढ़ाई के दौरान 'द लैंग्वेजेज ऑफ इंडिया' पर एक मजेदार प्रोजेक्ट / गतिविधि में भाग लेगा; उदाहरण के लिए, ग्रेड 6-8 में "एक भारत श्रेष्ठ भारत"पहल। इस प्रोजेक्ट/ गतिविधि में, छात्र अधिकांशरूप से प्रमुख भारतीय भाषाओं की उल्लेखनीय एकता के बारे में जानेंगे, जिसके तहत उनके सामान्य ध्वन्यात्मक और वैज्ञानिक रूप से व्यवस्थित वर्णमाला और लिपियों, उनकी सामान्य व्याकरणिक संरचनाओं, संस्कृत और अन्य शास्त्रीय भाषा से इनकी शब्दावली के स्रोत और उद्धव को ढूँढ़ने से लेकर इन भाषा के समृद्ध अंतर-प्रभाव और अंतरों को समझना शामिल है।

वे यह भी जानेंगे कि कौन से भौगोलिक क्षेत्र में कौन सी भाषाएं बोलते हैं, आदिवासी भाषाओं की प्रकृति और संरचना को समझेंगे, और भारत की हर प्रमुख भाषा में कुछ पंक्तियाँ और प्रत्येक के समृद्ध और उभरते साहित्य के बारे में कुछ कहना सीखेंगे (आवश्यक अनुवाद के माध्यम से)। इस तरह की गतिविधि से उन्हें भारत की एकता और सुंदर सांस्कृतिक विरासत और विविधता दोनों का एहसास होगा और अपने पूरे जीवन भर वे भारत के अन्य हिस्सों के लोगों से मिलने और घुलने-मिलने में सहज महसूस करेंगे। यह प्रोजेक्ट /गतिविधि एक रुचिकर और आनंददायी गतिविधि होगी और इसमें किसी भी रूप में मूल्यांकन शामिल नहीं होगा।

भारत की शास्त्रीय भाषाओं में अध्ययन

4.17 भारत की शास्त्रीय भाषाओं और साहित्य के महत्व, प्रासंगिकता और सुंदरता को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। संस्कृत, संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्णित एक महत्वपूर्ण आधुनिक भाषा होते हुए भी, इसका शास्त्रीय साहित्य इतना विशाल है कि सारे लैटिन और ग्रीक साहित्य को भी यदि मिलाकर इसकी तुलना की जाए तो भी इसकी बराबरी नहीं कर सकता। संस्कृत साहित्य में गणित, दर्शन, व्याकरण, संगीत, राजनीति, चिकित्सा, वास्तुकला, धातु विज्ञान, नाटक, कविता, कहानी, और बहुत कुछ (जिन्हें "संस्कृत ज्ञान प्रणालियों" के रूप में जाना जाता है), के विशाल खजाने हैं।

इन सबको विभिन्न धर्मों के लोगों के साथ-साथ गैर-धार्मिक लोगों और जीवन के सभी क्षेत्रों और सामाजिक-अआर्थिक पृष्ठ भूमि के लोगों द्वारा हजारों वर्षों में लिखा गया है। इस प्रकार संस्कृत को, त्रि-भाषा के मुख्यधारा विकल्प के साथ, स्कूल और उच्चतर शिक्षा के सभी स्तरों पर छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण, समृद्ध विकल्प के रूप में पेश किया जाएगा। यह उन तरीकों से पढ़ाया जाएगा जो दिलचस्प और अनुभवात्मक होने के साथ-साथ समकालीन रूप से प्रासंगिक हैं, जिसमें संस्कृत ज्ञान प्रणली का उपयोग शामिल है, और विशेष रूप से ध्वनि और उच्चारण के माध्यम से। फाउंडेशनल और मिडिल स्कूल स्तर पर संस्कृत की पाठ्यपुस्तकों को संस्कृत के माध्यम से संस्कृत पढ़ाने (एसटीएस) और इसके अध्ययन को आनंददायी बनाने के लिए सरल मानक संस्कृत (एसएसएस) में लिखा जा सकता है।

4.18 भारत में शास्त्रीय तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, और ओडिया सहित अन्य शास्त्रीय भाषाओं में एक अत्यंत समृद्ध साहित्य है; इन शास्त्रीय भाषाओं के अतिरिक्त, पालि, फारसी, प्राकृत और उनके साहित्य को भी उनकी समृद्धि के लिए और भावी पीढ़ी के सुख और समृद्धि के लिए संरक्षित किया जाना चाहिए। जैसे ही भारत पूरी तरह से विकसित देश बनेगा, अगली पीढ़ी भारत के व्यापक और सुंदर शास्त्रीय साहित्य के अध्ययन में भाग लेना और इंसान के रूप में समृद्ध बनना चाहेगी। संस्कृत के अलावा, भारत की अन्य शास्त्रीय भाषाएं और साहित्य, जिनमें तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, ओड़िया, पालि, फारसी और प्राकृत शामिल हैं, स्कूलों में भी व्यापक रूप से छात्रों के लिए विकल्प के रूप संभवतः ऑनलाइन मॉड्यूल के रूप में अनुभवात्मक और अभिनव एप्रोच के माध्यम से उपलब्ध होंगे ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ये भाषा और साहित्य जीवित और जीवंत रहें। सभी भारतीय भाषाओं, जो समृद्ध मौखिक और लिखित साहित्य, सांस्कृतिक परंपराओं और ज्ञान को अपने में संजोए हुए हैं, के लिए भी इसी प्रकार के प्रयास किए जाएंगे।

4.19 देश के बच्चों के संवर्धन के लिए, और इन समृद्ध भाषाओं और उनके कलात्मक खजाने के संरक्षण के लिए, सार्वजनिक या निजी सभी स्कूलों में सभी विद्यार्थियों के पास, भारत की शास्त्रीय भाषाओं और उससे जुड़े साहित्य को कम से कम दो साल सीखने का विकल्प होगा। अनुभवात्मक और नवीन विधियों, जिनमें प्रौद्योगिकी के एकीकरण भी शामिल होंगे, के माध्यम से ग्रेड 6 से 12 तक के विद्यार्थी इन्हें सीख पाएंगे। मिडिल से सेकेंडरी स्तर तक और यहाँ तक कि इसके आगे भी इनका अध्ययन करते रहने का विकल्प उनके पास होगा।

4.20 भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी में उच्चतर गुणवत्ता वाले कोर्स के अलावा, विदेशी भाषाएं, जैसे कोरियाई, जापानी, थाई, फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश, पुर्तगाली और रूसी भी माध्यमिक स्तर पर व्यापक रूप से अध्ययन हेतु उपलब्ध करवाई जाएंगी, ताकि विद्यार्थी विश्व-संस्कृतियों के बारे में जानें, और अपनी रुचियों और आकांक्षाओं के अनुसार अपने वैश्विक ज्ञान को और दुनिया भर में घूमने-फिरने को सहजता से बढ़ा सकें।

4.21 सभी भाषाओं के शिक्षण को नवीन और अनुभवात्मक विधियों के माध्यम से समृद्ध किया जाएगा, जिसमें सरलीकरण और ऐप्स के माध्यम से, भाषाओं के सांस्कृतिक पहलुओं जैसे कि फिल्म, थिएटर, कथावाचन, काव्य और संगीत को जोड़ते हुए, और विभिन्न प्रासंगिक विषयों के साथ और वास्तविक जीवन के अनुभवों के साथ संबंधों को दिखाते हुए इन्हें सिखाया जाएगा। इस प्रकार, भाषाओं का शिक्षण भी अनुभवात्मक-अधिगम शिक्षणशास्त्र पर आधारित होगा।

4.22 भारतीय साइन लैंग्वेज (आईएसएल) को देश भर में मानकीकृत किया जाएगा, और राष्ट्रीय और राज्य पाठयक्रम सामग्री विकसित की जाएगी, जो बधिर विद्यार्थियों द्वारा उपयोग की जाएगी। जहाँ संभव और प्रासंगिक हो वहाँ स्थानीय सांकेतिक भाषाओं का सम्मान किया जाएगा और उन्हें सिखाया जाएगा।

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