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व्यावसायिक शिक्षा का नवीन आकल्पन

व्यावसायिक शिक्षा का नवीन आकल्पन


16.1 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-2017) के अनुमान के अनुसार 19-24 आयुवर्ग में आने वाले भारतीय कार्यबल के अत्यंत ही कम प्रतिशत (5% से कम) लोगों ने औपचारिक व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त की; जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में 52%, जर्मनी में 75% और दक्षिण कोरिया में अत्यंत अधिक 96% पर यह संख्या काफी अधिक है । ये संख्या भारत में व्यावसायिक शिक्षा के प्रसार में तेजी लाने की आवश्यकता को पूरी स्पष्टता से रेखांकित करती हैं।

16.2 व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों की कम संख्या होने के पीछे एक प्रमुख कारण यह तथ्य है कि अतीत में व्यावसायिक शिक्षा मुख्य रूप से कक्षा 11-12 और कक्षा 8 और उससे ऊपर की कक्षा के ड्रॉपआउट्स पर केंद्रित थी। इसके अलावा, व्यावसायिक विषयों के साथ 11वीं-12वीं पास करने वाले विद्यार्थियों के पास अक्सर उच्चतर शिक्षा में अपने चुने हुए व्यवसाय क्षेत्र में आगे बढ़ने का स्पष्ट मार्ग नहीं होता है। सामान्य उच्चतर शिक्षा के लिए प्रवेश मानदंड भी व्यावसायिक शिक्षा की योग्यता वाले विद्यार्थियों के लिए अवसरों की उपलब्धता को सुनिश्चित करने की दृष्टि से डिज़ाइन नहीं किए गए थे, फलस्वरूप वे अपने ही देश के अन्य लोगों के सापेक्ष 'मुख्य धारा की शिक्षा' या 'अकादेमिक शिक्षा' से वंचित रह जा रहे थे। इसने व्यावसायिक शिक्षा के विषयों से संबंधित विद्यार्थियों के लिए शिक्षा में सीधे-सीधे आगे बढ़ने के रास्तों को पूरी तरह से बंद ही कर दिया, और यह एक ऐसा मुद्दा है जिसे अभी वर्ष 2013 में राष्ट्रीय कौशल योग्यता फ्रेमवर्क (एनएसक्यूएफ) की घोषणा के माध्यम से संबोधित करने का प्रयास किया गया है।

16.3 व्यावसायिक शिक्षा को मुख्यधारा की शिक्षा से कम महत्व की शिक्षा माना जाता है और यह भी माना जाता है कि यह मुख्य रूप से उन विद्यार्थियों के लिए है जो मुख्यधारा की शिक्षा के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पाते। यह एक ऐसी धारणा है जो आज भी जस की तस बनी हुई है, और विद्यार्थियों द्वारा चुने गए विकल्पों को प्रभावित करती है । यह एक गंभीर चिंता का विषय है और इससे निपटने के इस तथ्य को पुनर्कल्पित किए जाने की आवश्यकता है कि भविष्य में छात्रों के समक्ष व्यावसायिक शिक्षा की पेशकश किस प्रकार की जाती है।

16.4 इस नीति का उद्देश्य व्यावसायिक शिक्षा से जुड़ी सामाजिक पदानुक्रम की स्थिति को दूर करना है, और इसके लिए आवश्यक होगा कि समस्त शिक्षण संस्थान, जैसे - स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय, चरणबद्ध तरीके से व्यावसायिक शिक्षा के कार्यक्रमों को मुख्यधारा की शिक्षा में एकीकृत करें, और इसकी शुरुआत आरंभिक वर्षों में व्यावसायिक शिक्षा के अनुभव प्रदान करने से हो जो कि फिर सुचारु रूप से उच्चतर प्राथमिक, माध्यमिक, कक्षाओं से होते हुए उच्चतर शिक्षा तक जाए । इस तरह से व्यावसायिक शिक्षा को एकीकृत करना यह सुनिश्चित करेगा कि प्रत्येक बच्चा कम से कम एक व्यवसाय से जुड़े कौशलों को सीखे और अन्य कई व्यवसायों से इस प्रकार परिचित हो। ऐसा करने के परिणामस्वरूप वो श्रम की महत्ता और भारतीय कलाओं और कारीगरी सहित अन्य विभिन्न व्यवसायों के महत्व से परिचित होगा।

 16.5 वर्ष 2025 तक, स्कूल और उच्चतर शिक्षा प्रणाली के माध्यम से कम से कम 50% विद्यार्थियों को व्यावसायिक शिक्षा का अनुभव प्रदान किया जाएगा जिसके लिए लक्ष्य और समयसीमा के साथ एक स्पष्ट कार्य योजना विकसित की जाएगी । यह सतत विकास लक्ष्यों के लक्ष्य संख्या 4.4 के साथ संगतता रखते है, और भारत के जनसंख्या-रूपी संसाधन के पूर्ण लाभ को प्राप्त करने में मदद करेगा | जीईआर के लक्ष्यों को तय करते वक़्त व्यावसायिक शिक्षा से जुड़े विद्यार्थियों की संख्या को भी ध्यान में रखा जाएगा। व्यावसायिक क्षमताओं का विकास और 'अकादेमिक' या अन्य क्षमताओं का विकास साथ- साथ होगा। अगले दशक में चरणबद्ध तरीके से सभी माध्यमिक स्कूलों के शैक्षणिक विषयों में व्यावसायिक शिक्षा को एकीकृत किया जाएगा। इसके लिए, माध्यमिक विद्यालय, आईटीआई पॉलिटेक्निक और स्थानीय उद्योगों आदि से साथ संपर्क और सहयोग करेंगे। स्कूलों में हब और स्पोक मॉडल में कौशल प्रयोगशालाएं भी स्थापित और सृजित की जाएंगी, जहाँ अन्य स्कूल भी इस सुविधा का उपयोग कर सकेंगे। उच्चतर शिक्षा संस्थान स्वयं ही या फिर उद्योगों और गैर-सरकारी संगठनों के साथ साझेदारी में व्यावसायिक शिक्षा प्रदान करेंगे। वर्ष 2013 में शुरू की गई डिग्री बी.वोक पूर्व की तरह ही जारी रहेगी, लेकिन इसके अतिरिक्त भी
व्यावसायिक पाठ्यक्रम अन्य सभी स्नातक डिग्री कार्यक्रमों में नामांकित छात्रों के लिए उपलब्ध होंगे, जिसमें 4-वर्षीय बहु-विषयक स्रातक कार्यक्रम भी शामिल रहेगा। उच्चतर शिक्षण संस्थानों को सॉफ्ट स्किल्स सहित विभिन्न कौशलों में सीमित अवधि के सर्टिफिकेट कोर्स करने की भी अनुमति होगी। 'लोक विद्या, अर्थात्‌ भारत में विकसित महत्वपूर्ण व्यावसायिक ज्ञान से जुड़े विषयों को व्यावसायिक शिक्षा पाठ्यक्रमों में एकीकरण के माध्यम से छात्रों के लिए सुलभ बनाया जाएगा। जहाँ भी संभव हो, ओडीएल मोड के माध्यम से भी व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को संचालित करने की संभावना तलाश की जाएगी।

16.6 अगले दशक में व्यावसायिक शिक्षा को चरणबद्ध तरीके से सभी स्कूल और उच्चतर शिक्षा संस्थानों में एकीकृत किया जाएगा। व्यावसायिक शिक्षा के फोकस एरिया का चुनाव कौशल अंतर विश्लेषण (स्किल गैप एनालिसिस) और स्थानीय अवसरों के आधार पर किया जाएगा। मानव संसाधन विकास मंत्रालय इस पहल की देखरेख के लिए उद्योगों के सहयोग से, व्यावसायिक शिक्षा के विशेषज्ञों और व्यावसायिक मंत्रालयों के प्रतिनिधियों के साथ मिलकर एक राष्ट्रीय समिति नेशनल कमेटी फॉर द इंटीग्रेशन ऑफ वोकेशनल एजुकेशन (एनसीआईवीई) का गठन करेगा।

16.7 सबसे पहले इस प्रक्रिया को आरंभ करने वाले संस्थानों के लिए यह आवश्यक है कि वे नवाचार के माध्यम से ऐसे मॉडल और प्रणालियों की खोज करें जो कि सफल हों और फिर उन्हें एनसीआईवीई द्वारा स्थापित तंत्र के माध्यम से अन्य संस्थानों के साथ साझा करें, ताकि व्यावसायिक शिक्षा की पहुँच को विस्तार देने में सहायता मिल सके। व्यावसायिक शिक्षा और अप्रेंटिसशिप प्रदान करने वाले विभिन्न मॉडलों को उच्चतर शिक्षा संस्थानों द्वारा भी प्रयोग में लाया जाएगा । उद्योगों के साथ साझेदारी के तहत उच्चतर शिक्षा संस्थानों में इन्क्यूबेशन केंद्र स्थापित किए जाएंगे |

16.8 राष्ट्रीय कौशल योग्यता फ्रेमवर्क (एनएसक्यूएफ) को प्रत्येक विषय व्यवसाय / रोजगार के लिए अधिक विस्तारपूर्वक निर्मित किया जाएगा । इसके अलावा, भारतीय मानकों को अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा बनाए गए व्यवसायों के अंतर्राष्ट्रीय मानक वर्गीकरण के साथ जोड़ा जाएगा । यह फ्रेमवर्क पूर्ववर्ती शिक्षा की आवश्यकता के लिए आधार प्रदान करेगा । इसके माध्यम से, ड्रॉपआउट हो चुके बच्चों के व्यावहारिक अनुभव को फ्रेमवर्क के प्रासंगिक स्तर के साथ जोड़कर उन्हें पुन: औपचारिक प्रणाली से जोड़ा जाएगा । क्रेडिट आधारित यह फ्रेमवर्क, छात्रों को 'सामान्य' से व्यावसायिक शिक्षा तक जाने को सुगम बनाएगा।

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