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स्कूल कॉम्प्लेक्स और कलस्टर

स्कूल कॉम्प्लेक्स/कलस्टर के माध्यम से कुशल संसाधन और प्रभावी गवर्नेंस

7.1 अब समग्र शिक्षा योजना के तहत समाहित सर्व शिक्षा अभियान(एसएसए) और देशभर के राज्यों में होने वाले अन्य प्रयासों द्वारा देश के हर बसाहट में प्राथमिक स्कूलों की स्थापना ने प्राथमिक स्कूलों में लगभग सार्वभौमिक पहुँच को सुनिश्चित करने में तो मदद की है लेकिन इससे कई कम छात्र संख्या वाले स्कूल भी वजूद में आए हैं। यू-डाइज, 2016-17 के आंकड़े के अनुसार, भारत के 28% सरकारी प्राथमिक स्कूलों और 14.8% उच्चतर प्राथमिक स्कूलों में 30 से भी कम छात्र पढ़ते हैं। कक्षा 1 से 8 तक के स्कूलों में प्रति कक्षा औसतन 14 छात्र हैं जबकि बहुत से स्कूलों में तो यह औसत मात्र 6 से कम है। वर्ष 2016-17 में 108107 स्कूल एकल शिक्षक स्कूल थे। इनमें से अधिकांश (85743) कक्षा 1 से 5 वाले प्राथमिक स्कूल थे।

7.2 इन कम संख्या वाले स्कूलों के चलते शिक्षकों के नियोजन के साथ-साथ महत्वपूर्ण भौतिक संसाधनों के उपलब्धता की दृष्टि से अच्छे स्कूलों का संचालन जटिल होने के साथ-साथ व्यवहारिक नहीं है। शिक्षकों को अक्सर एक साथ कई कक्षाएं पढ़ानी पड़ती है, और कई विषयों को भी जिसमें वह विषय भी शामिल हो सकते हैं जिनमें उनकी पहले से कोई पृष्ठभूमि नहीं होती है; जैसे संगीत, कला, खेल जैसे प्रमुख क्षेत्र बहुत बार सिखाए नहीं जाते हैं और भौतिक संसाधन जैसे प्रयोगशाला और खेल उपकरण और पुस्तकालय की किताबें स्कूलों में कम ही उपलब्ध हैं।

7.3 छोटे स्कूलों के अलगाव का भी शिक्षा और शिक्षण-शिक्षण प्रक्रिया पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। शिक्षक समुदायों और टीमों में सबसे अच्छा काम करते हैं, और इसी प्रकार छात्र भी करते हैं। छोटे स्कूल भी शासन और प्रबंधन के लिए एक प्रणालीगत चुनौती पेश करते हैं। भौगोलिक फैलाव, चुनौतीपूर्ण पहुंच की स्थिति और स्कूलों की बहुत बड़ी संख्या सभी स्कूलों तक समान रूप से पहुंचना मुश्किल बना देती है। प्रशासनिक संरचनाओं को स्कूल की संख्या में वृद्धि या समग्र शिक्षा योजना के एकीकृत ढांचे में नहीं जोड़ा गया है।

7.4 हालांकि स्कूलों का समेकन एक ऐसा विकल्प है जिस पर हमेशा चर्चा की जाती है, इसे बहुत ही सोच समझकर किया जाना चाहिए और केवल तभी किया जाना चाहिए जब यह सुनिश्चित कर लिया जाए कि इसकी पहुँच पर कोई प्रभाव न पड़े। इस तरह के उपायों के परिणामस्वरूप केवल छोटे पैमाने पर समेकन की संभावना दिखती है, और बड़ी संख्या में छोटे स्कूलों द्वारा उपजी संरचनात्मक समस्या और चुनौतियों का समाधान नहीं होगा।

7.5 इन चुनौतियों को राज्य/केन्द्र शासित प्रदेश की सरकारों द्वारा 2025 तक स्कूलों के समूह बनाने या उनकी संख्या को समुचित रूप देने के लिए नवीन प्रक्रिया अपनाकर समाधान किया जाएगा। इस तरह की प्रक्रिया के पीछे का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होगा कि: 
  • हर स्कूल में कला, संगीत विज्ञान, खेल, भाषा, व्यावसायिक विषय, आदि सहित सभी विषयों को पढ़ाने के लिए पर्याप्त संख्या में परामर्शदाता (काउंसलर)/प्रशिक्षित सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षक (साझा या अन्यथा) मौजूद हों; 
  • हर स्कूल में पर्याप्त संसाधन (साझा या अन्यथा) हों, जैसे कि एक पुस्तकालय, विज्ञान प्रयोगशाला, कंप्यूटर लैब, कौशल प्रयोगशाला, खेल के मैदान, खेल उपकरण जैसी सुविधाएं, आदि; 
  • शिक्षकों, छात्रों और स्कूलों के अलगाव को दूर करने के लिए समुदाय के साथ एक समझ बनाकर संयुक्त व्यवसायिक विकास कार्यक्रमों, शिक्षण-अधिगम सामग्री के साझाकरण, संयुक्त सामग्री निर्माण, कला और विज्ञान प्रदर्शनियां, खेल गतिविधियां, क्रिज और डिबेट, और मेले जैसे संयुक्त गतिविधियों का आयोजन करना; और 
  • विकलांग बच्चों की शिक्षा के लिए स्कूलों में सहयोग और संबलन; 
  • स्कूली व्यवस्था की गवर्नेंस में सुधार के लिए क्रियान्वयन संबंधी बारीकियों के निर्णय स्कूली समूह के स्तर पर छोड़ दिए जाएँ जहाँ उन्हें स्थानीय स्तर पर प्रधानाचार्य, शिक्षक और अन्य हितधारकों द्वारा ही लिया जाये - और फाउंडेशनल स्तर से सेकेंडरी स्तर के ऐसे स्कूलों के समूह को एक एकीकृत अर्ध-स्वायत्त इकाई के रूप में देखा जाये।

7.6 उपरोक्त को पूरा करने के लिए एक संभावित तंत्र स्कूल परिसर नामक एक समूहन संरचना की स्थापना होगी, जिसमें एक माध्यमिक विद्यालय होगा जिसमें पांच से दस किलोमीटर के दायरे में आंगनवाड़ी केन्द्रों सहित अपने पड़ोस में निचले ग्रेड की पेशकश करने वाले अन्य सभी विद्यालय होंगे। यह सुझाव सर्वप्रथम शिक्षा आयोग (1964-66) द्वारा दिया गया था लेकिन इसे लागू नहीं किया गया था। यह नीति जहाँ भी संभव हो, स्कूल परिसर / क्लस्टर के विचार का हदृढ़ता से समर्थन करती है। स्कूल परिसर / क्लस्टर का उद्देश्य अधिक संसाधन दक्षता और क्लस्टर में स्कूलों के अधिक प्रभावी कामकाज, समन्वय, नेतृत्व, शासन और प्रबंधन होगा।

7.7 स्कूल कॉम्प्लेक्स/कलस्टर बनने से और कॉम्प्लेक्स में संसाधन के साझे उपयोग से दूसरे भी बहुत से लाभ होंगे, जैसे दिव्यांग बच्चों के लिए बेहतर सहयोग; ज़्यादा विविध विषय पर आधारित विद्यार्थी क्लब और स्कूल परिसर में अकादमिक/खेल/कला/शिल्प आधारित कार्यक्रमों का आयोजन; कला, संगीत, भाषा और शारीरिक शिक्षा के शिक्षक के साझे उपयोग से कक्षा में वर्चुअल कक्षाएं आयोजित करने के लिए आईसीटी टूल्स के उपयोग सहित इन गतिविधियों का ज़्यादा समावेश; सामाजिक कार्यकर्ता और सलाहकारों (काउंसलर) की मदद से विद्यार्थियों के लिए बेहतर सहयोग की उपलब्धता और बेहतर नामांकन, उपस्थिति और उपलब्धियों में सुधार, और स्कूल कॉम्प्लेक्स प्रबंधन समितियों(केवल स्कूल प्रबंधन समितियों के बजाए) के माध्यम से बेहतर और मज़बूत गवर्नेंस, निरीक्षण, निगरानी, नवाचार और स्थानीय हितधारकों द्वारा उठाए जाने वाले क़दम। स्कूलों, स्कूल प्रमुखों, शिक्षकों, विद्यार्थियों, सहयोगी स्टाफ, माता-पिता और स्थानीय नागरिकों के बड़े और जीवंत समूहों के आधार पर संसाधनों का कुशल उपयोग करते हुए पूरी शिक्षा व्यवस्था उर्जावान और समर्थ बनेगी।

7.8 स्कूल कॉम्प्लेक्स/क्लस्टर व्यवस्था से विद्यालयों का गवर्नेंस भी सुधरेगा और अधिक कुशल बनेगा। पहले, डीएसई स्कूल कॉम्प्लेक्स/क्लस्टर के स्तर पर अधिकार देगा जो एक अर्ध-स्वायत्त इकाई के रूप में कार्य करेगा। जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) और ब्लॉक शिक्षा अधिकार (बीईओ) हर स्कूल कॉम्प्लेक्स/क्लस्टर को एक इकाई मानकर उसके साथ कार्य करेंगे। कॉम्प्लेक्स डीएसई द्वारा सौंपी जाने वाली जिम्मेदारियों को निभायेंगे और उसके तहत आने वाले प्रत्येक स्कूल समन्वय करेंगे। डीएसई द्वारा स्कूल कॉम्प्लेक्स/क्लस्टर को काफी स्वायत्तता प्रदान की जाएगी जिसके बल पर वे, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या फ्रेमवर्क (एनसीएफ) और स्टेट पाठ्यचर्या फ्रेमवर्क (एससीएफ) का अनुपालन करते हुए, समच्वित शिक्षा प्रदान करने की दिशा में जरुरी रचनात्मक कदम उठा सकें और पाठ्यचर्या, शिक्षण-शास्त्र के स्तर पर प्रयोगधर्मी हो पायें। इस संगठन के तहत, स्कूल मजबूत होंगे, ज्यादा स्वायत्तता पूर्वक कार्य कर पाएंगे और इससे कॉम्प्लेक्स अधिक नवाचारी और जिम्मेदार बनेगें। इस दौरान, डीएसई बड़े स्तर के लक्ष्यों पर ध्यान दे पायेगा जिससे पूरी शिक्षा व्यवस्था की प्रभाविता में सुधार हो ।

7.9 इन कॉम्प्लेक्स/क्लस्टर द्वारा दोनों दीर्घकालिक और अल्पकालिक सन्दर्भ में एक योजनाबद्ध तरीके से काम करने की संस्कृति का विकास होगा। स्कूल एसएमसी की मदद से अपनी योजनायें (एसडीपी) बनायेंगे। स्कूलों के प्लान के आधार पर स्कूल कॉम्प्लेक्स/क्लस्टर विकास योजना (एससीडीपी) बनाये जायेंगे। एससीडीपी में कॉम्प्लेक्स से सम्बंधित अन्य सभी संस्थानों, जैसे व्यावसायिक शिक्षा संस्थान, के प्लान शामिल होंगे और इसे कॉम्प्लेक्स के प्रधानाचार्य एवं शिक्षक एससीएमसी की मदद से तैयार करेंगे और इस योजना को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध भी किया जायेगा। इस योजना में शामिल होंगे - मानव संसाधन, शिक्षण-अधिगम संसाधन, भौतिक संसाधन और इंफ्रास्ट्रक्चर, सुधार के लिए ली जाने वाली पहलें, वित्तीय संसाधन, स्कूल संस्कृति सम्बन्धी पहलें, शिक्षक क्षमता संवर्धन योजना और शैक्षणिक परिणामों सम्बन्धी लक्ष्य। उसमें कॉम्प्लेक्स भर के शिक्षकों और विद्यार्थियों के समूह को एक जीवंत अधिगम केद्ित समुदाय के रूप में विकसित करने के प्रयासों का ब्यौरा भी होगा। एसडीपी और एससीडीपी वे माध्यम होंगे जिनसे डीएसई समेत सभी हितधारक परस्पर जुड़ाव बनाये रखेंगे। एसएमसी और एससीएमसी, एसडीपी और एससीडीपी का उपयोग स्कूलों की कार्य प्रणली और दिशा पर नज़र रखने के लिए करेंगे और योजनाओं के क्रियान्वयन में सहयोग करेंगे। डीएसई, बीईओ जैसे उपयुक्त अधिकारी द्वारा हर स्कूल
कॉम्प्लेक्स के एससीडीपी को स्वीकृति देंगे। इसके उपरांत, डीएसई इन योजनाओं की सफलता के लिए, अल्पावधि (एक वर्ष) और दीर्घावधि (3 से 5 वर्ष) के लिए संसाधन (वित्तीय, मानव और भौतिक आदि) उपलब्ध कराएंगें । शैक्षणिक उपलब्धियों को हासिल करने के लिए अन्य प्रासंगिक सहयोग भी उनके द्वारा प्रदान किया जायेगा। डीएसई और एससीईआरटी सभी स्कूलों के साथ एसडीपी और एससीडीपी के विकास के लिए विशेष मानक (उदाहरण के लिए वित्तीय, स्टाफ और प्रक्रिया सम्बन्धी) और फ्रेमवर्क उपलब्ध कराएगी जिन्हें समय-समय पर संशोधित किया जायेगा। SCDP stand for School & Complex Development Program.

7.10 निजी और सार्वजनिक स्कूलों सहित सभी स्कूलों के बीच परस्पर सहयोग और सकारात्मक तालमेल बढ़ाने के लिए देश भर में एक निजी और एक सार्वजनिक विद्यालय को परस्पर सम्बद्ध किया जायेगा जिससे ऐसे सम्बद्ध स्कूल एक-दूसरे से मिल/ सीख सकें और संभव हो तो एक-दूसरे के संसाधनों से भी लाभाच्वित हो सकें। जहाँ संभव हो, इन दोनों प्रकार के स्कूलों की अच्छी प्रैक्टिस का दस्तावेजीकरण किया जायेगा, वितरण किया जायेगा और उन्हें पब्लिक स्कूलों की स्थापित प्रक्रियाओं में शामिल किया जायेगा।

7.11 हर राज्य/जिले को प्रोत्साहित किया जायेगा कि वह 'बाल भवन' स्थापित करे जहाँ हर उम्र के बच्चे सप्ताह में एक या अधिक बार (उदाहरण के लिए सप्ताहांत में) जा सकें और कला, खेल और करियर संबंधी गतिविधियों में भागीदारी कर सकें। ऐसे बाल भवन जहाँ संभव हो स्कूल कॉम्प्लेक्स/क्लस्टर के हिस्से भी हो सकते हैं।

7.12 स्कूल पूरे समुदाय के लिए सम्मान का और उत्सव का स्थान होना चाहिए। एक संस्थान के रूप में स्कूल की प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करना चाहिए और स्कूल स्थापना दिवस जैसे महत्वपूर्ण दिवस समुदाय के साथ मिलकर मनाये जाने चाहिए। इस दिन स्कूल के विशिष्ट भूतपूर्व विद्यार्थियों की सूची प्रदर्शित की जानी चाहिए और उनका सम्मान होना चाहिए। इस्तेमाल में न आने वाले समय अथवा दिनों में स्कूल की भौतिक सुविधाओं का उपयोग समुदाय के लिए बौद्धिक, सामाजिक और स्वयंसेवी गतिविधियों के आयोजन के लिए और सामाजिक मेलजोल के लिए किया जाना चाहिए जिससे स्कूल एक 'सामाजिक चेतना केंद्र' के रूप में भी भूमिका निभाये।

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