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ड्रॉपआउट बच्चों की संख्या कम करना Shiksha Niti Chapter 3

ड्रॉपआउट बच्चों की संख्या कम करना और सभी स्तरों पर शिक्षा की सार्वभौमिक पहुंच सुनिश्चित करना

शिक्षा निति 2020 अध्याय 3

3.1 स्कूली शिक्षा प्रणाली के प्राथमिक लक्ष्यों में हमें यह सुनिश्चित करना है कि बच्चों का स्कूल में नामांकन हो और उन्हें नियमित रूप से विद्यालय भेजा जाए। सर्व शिक्षा अभियान (अब समग्र शिक्षा) और शिक्षा का अधिकार अधिनियम जैसी पहल के माध्यम से भारत ने हाल के वर्षों में प्राथमिक शिक्षा में लगभग सभी बच्चों का नामांकन प्राप्त करने में उल्लेखनीय प्रगति की है। हालांकि बाद के आंकड़े बच्चों के स्कूली व्यवस्था में ठहराव संबंधी कुछ गंभीर मुद्दों की ओर इशारा करते हैं।

कक्षा छठी से आठवीं का जीईआर 90.9 प्रतिशत है, जबकि कक्षा 9-10 और 11-2 के लिए यह क्रमशः केवल 79.3% और 56.5% है। यह आंकड़े यह दर्शातें हैं कि किस प्रकार से कक्षा 5 और विशेष रूप से कक्षा 8 के बाद नामांकित छात्रों का एक महत्वपूर्ण अनुपात शिक्षा प्रणाली से बाहर हो जाता है। वर्ष 2017-18 में एनएसएसओ के 75वें राउंड हाऊसहोल्ड सर्वे के अनुसार, 6 से 17 वर्ष के बीच की उम्र के विद्यालय न जाने वाले बच्चों की संख्या 3.22 करोड़ है। इन बच्चों को यथासंभव पुनः शिक्षा प्रणाली में शीघ्र वापस लाना देश की सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। इसके साथ ही 2030 तक प्री स्कूल से माध्यमिक स्तर में 100% सकल नामांकन अनुपात प्राप्त करने के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ना होगा और भविष्य के छात्रों का ड्रॉपआउट दर भी कम करना होगा। पूर्व-प्राथमिक से कक्षा 12 तक की शिक्षा - व्यावसायिक शिक्षा सहित देश के सभी बच्चों को सार्वभौमिक पहुंच और अवसर प्रदान करने के लिए एक ठोस राष्ट्रीय प्रयास किया जाएगा।

3.2 कुल मिलाकर दो पहल की जाएँगी जिससे बच्चों का विद्यालय में वापसी और आगे के बच्चों को ड्रॉपआउट होने से रोका जा सके। पहला प्रभावी और पर्याप्त बुनियादी ढाँचा प्रदान करता है ताकि सभी छात्रों को इसके माध्यम से प्री-प्राइमरी स्कूल से कक्षा 12 तक सभी स्तरों पर सुरक्षित और आकर्षक स्कूली शिक्षा प्राप्त हो सके। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक स्तर पर नियमित प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध कराने के अलावा विशेष देखभाल की जाए ताकि यह सुनिश्चित किया जाए कि किसी स्कूल में अवस्थापना की कमी न हो।

सरकारी स्कूलों की विश्वसनीयता फिर से स्थापित की जाएगी और ऐसा मौजूदा स्कूलों का उन्नयन और विस्तार करके, जहाँ स्कूल नहीं हैं वहाँ अतिरिक्त गुणवत्ता स्कूल बनाकर और छात्रावासों विशेषकर बालिका छात्रावासों तक सुरक्षित और व्यावहारिक पहुँच प्रदान करके किया जा सकता है ताकि सभी बच्चों को अच्छे स्कूल में जाने और समुचित स्तर तक पढ़ने का अवसर मिले। प्रवासी मज़दूरों के बच्चों और विविध परिस्थितियों में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों को मुख्यधारा शिक्षा में वापस लाने के लिए सिविल समाज के सहयोग से वैकल्पिक और नवीन शिक्षा केंद्र स्थापित किए जाएँगे।

3.3 दूसरा यह है कि स्कूलों में सभी बच्चों की सहभागिता सुनिश्चित हो, इसके लिए बहुत ध्यान से सभी विद्यार्थियों की ट्रैकिंग करनी होगी, साथ-साथ उनके सीखने के स्तर पर भी नज़र रखनी होगी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे (क) स्कूल में दाखिला ले रहे हैं और उपस्थित हो रहे हैं (ख) ड्रॉपआउट बच्चों के लौटने और यदि वे पीछे रह गए हैं तो उन्हें पुनः मुख्य धारा से जोड़ने के लिए पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध हैं। 

फाउंडेशनल स्टेज से लेकर कक्षा 12 तक की स्कूली शिक्षा के जरिये 18 वर्ष की आयु तक सभी बच्चों को समान गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करने के लिए बुनियादी सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। प्रशिक्षित शिक्षकों और कार्मिकों की भर्ती विद्यालय में की जाएगी जिससे शिक्षक हमेशा छात्रों और उसके अभिभावक के साथ कार्य कर सकें। इसके साथ यह भी सुनिश्चित किया जा सके कि सभी विद्यार्थी विद्यालय आ रहे हैं और सीख रहे हैं। राज्य और जिला स्तर पर दिव्यांग व्यक्तियों के सशक्तीकरण से जुड़े सिविल सोसायटी संगठन/ सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभागों के प्रशिक्षित और योग्य सामाजिक कार्यकर्ता राज्य / केन्द्र शासित प्रदेश सरकारों द्वारा अपनाए गए विभिन्न नवीन तंत्रों के माध्यम से इस आवश्यक कार्य को करने में स्कूलों से जुड़े हो सकते हैं।

3.4 जब एक बार विद्यालय का अवसंरचनात्मक ढांचा और बच्चों की भागीदारी सुनिश्चित हो जाए, तो कक्षा की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने के लिए काम करना होगा और छात्रों को कक्षा से जोड़े रखना एक महत्वपूर्ण काम होगा, ताकि छात्र (विशेष रूप से लड़कियां और सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित समूहों के विद्यार्थी) और उनके माता-पिता स्कूल में भागीदारी के प्रति अपनी रुचि न खोएं। इसके लिए एक मजबूत चैनल और स्थानीय भाषा के ज्ञान के साथ उत्कृष्ट शिक्षकों के लिए प्रोत्साहन प्रणाली की आवश्यकता होगी, जो उन क्षेत्रों में तेनात किए जाएं जहाँ ड्रॉपआउट दरें विशेष रूप से अधिक हैं।

3.5 सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित समूहों (एसईडीजी) पर विशेष जोर देते हुए सभी छात्रों को सीखने में मदद करने के लिए स्कूली शिक्षा के दायरे को व्यापक बनाना होगा ताकि औपचारिक और अनौपचारिक शिक्षा के अंदर सीखने के विभिन्न रास्ते उपलब्ध हो सकें। भारत के उन युवाओं के लिए जो किसी संस्थान में नियमित रूप से अध्ययन नहीं कर सकते नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग (एनआईओएस) और राज्यों के ओपन स्कूलों द्वारा प्रस्तुत ओपन एंड डिस्टेंस लर्निंग/ओडीएल) कार्यक्रम का विस्तार और सुदृढ़ीकरण किया जाएगा, ताकि ऐसे युवाओं की सीखने की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। एनआईओएस अपने वर्तमान कार्यक्रमों के अलावा निम्नलिखित कार्यक्रमों को भी ऑफर करेगा:

  • ए, बी और सी स्तरों की शिक्षा जो औपचारिक स्कूल प्रणाली के कक्षा 3, 5 और 8 के बराबर हैं;
  • माध्यमिक शिक्षा कार्यक्रम जो कक्षा 10 और 12 के बराबर हैं;
  • व्यावसायिक शिक्षा पाठ्यक्रम / कार्यक्रम;
  • और वयस्क साक्षरता और जीवन-संवर्धन कार्यक्रम।

एनआईओएस की तर्ज पर राज्य सरकारों को प्रोत्साहित किया जाएगा कि वे अपने राज्यों में पूर्व से स्थापित स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग (एसआईओएस) को सशक्त करके और नए संस्थानों की स्थापना करें और क्षेत्रीय भाषाओं में उपरोक्त कार्यक्रम इन संस्थानों के जरिये चलाएं।

3.6. दोनों सरकारों और गैर-सरकारी संस्थाओं के लिए विद्यालय के निर्माण को सरल करने के लिए संस्कृति, भूगोल और सामाजिक-संरचना के आधार पर स्थानीय विविधताओं को प्रोत्साहित करने, और शिक्षा के वैकल्पिक मॉडल बनाने की अनुमति देने के लिए स्कूलों के निर्माण संबंधी नियमों को हल्का बनाया जाएगा। इसका फोकस इनपुट पर कम और वांछित सीखने के परिणामों से संबंधित आउटपुट क्षमता पर अधिक केन्द्रित होगा। इनपुट्स संबंधित विनियम कुछ विशेष क्षेत्रों तक सीमित होंगे जिनका अध्याय 8 में उल्लेख किया गया है। स्कूलों के अन्य मॉडलों को भी पायलट किया जाएगा, जिसमें सार्वजनिक-फ़िलेंथ्रोपिक साझेदारियां शामिल हैं।

3.7 बच्चों के अधिगम में सुधार के लिए भूतपूर्व विद्यार्थियों और समुदाय से स्वयंसेवी प्रयासों को प्रोत्साहित किया जायेगा। इसमें शामिल हैं - स्कूलों में एक-एक बच्चे के लिए ट्यूटरिंग, साक्षरता शिक्षण और अन्य मदद हेतु अतिरिक्त कक्षाएं आयोजित करना, शिक्षकों को शिक्षण में मार्गदर्शन और मदद उपलब्ध कराना, विद्यार्थियों को व्यवसाय संबंधी मार्गदर्शन देना, प्रौढ़ शिक्षा केन्द्रों में प्रौढ़ साक्षरता में सहयोग करना; आदि। इस दृष्टि से स्कूल के भूतपूर्व विद्यार्थियों और स्थानीय समुदाय के स्वस्थ वरिष्ठ नागरिकों से उपयुक्त व्यक्तियों की पहचान की जाएगी। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए साक्षर स्वयंसेवकों, सेवानिवृत्त वैज्ञानिकों / सरकारी / अर्ध सरकारी कर्मचारियों, भूतपूर्व विद्यार्थियों और शिक्षाविदों का एक डेटाबेस तैयार किया जायेगा।

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