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गुणवत्तापूर्ण विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय

गुणवत्तापूर्ण विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय: भारतीय उच्चतर शिक्षा व्यवस्था हेतु एक नया और भविष्योन्मुखी दृष्टिकोण

9.1 उच्चतर शिक्षा मनुष्य और साथ ही सामाजिक कल्याण के विकास में अति आवश्यक भूमिका निभाती है। जैसा कि हमारे संविधान में भारत को एक लोकतांत्रिक, न्यायपूर्ण, सामाजिक रूप से सचेत, सांस्कारिक और मानवीय राष्ट्र जहाँ सभी के लिए न्याय, स्वतंत्रता, समानता, और भाईचारे का भाव हो, एक ऐसे राष्ट्र के रूप में विकसित करने की परिकल्पना की गई है। एक राष्ट्र के आर्थिक विकास और आजीविकाओं को स्थायित्व देने में भी उच्चतर शिक्षा एक महत्वपूर्ण योगदान देती है। जैसे-जैसे भारत ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था और समाज की ओर बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे और अधिक भारतीय युवा उच्चतर-शिक्षा की ओर बढ़ेंगे।
  • इक्कीसवी सदी की आवश्यकताओं को देखते हुए, गुणवत्तापूर्ण उच्चतर शिक्षा का ज़रूरी उद्देश्य, अच्छे, चिंतनशील, बहुमुखी प्रतिभा वाले रचनात्मक व्यक्तियों का विकास करना होना चाहिए। यह एक व्यक्ति को एक या एक से अधिक विशिष्ट क्षेत्रों में गहन स्तर पर अध्ययन करने में सक्षम बनाती है, और साथ ही चरित्र, नैतिक और संवैधानिक मूल्यों, बौद्धिक जिज्ञासा, वैज्ञानिक स्वभाव, रचनात्मकता, सेवा की भावना और विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, कला, मानविकी, भाषा, साथ ही व्यावसायिक, तकनीकी और व्यावसायिक विषयों सहित विभिन्न विषयों में 21 वीं सदी की क्षमताओं को विकसित करती है। 
  • उच्चतर गुणवत्ता वाली शिक्षा द्वारा व्यक्तिगत उपलब्धि और ज्ञान, रचनात्मक सार्वजनिक सहभागिता और समाज में उत्पादक योगदान को सक्षम करना चाहिए। इसे छात्रों को अधिक सार्थक और संतोषजनक जीवन और कार्य भूमिकाओं के लिए तैयार करना चाहिए और आर्थिक स्वतंत्रता को सक्षम करना चाहिए।
  • व्यक्तियों के समग्र विकास के उद्देश्य के लिए यह आवश्यक है कि पूर्व-विद्यालय से उच्चतर शिक्षा तक, सीखने के प्रत्येक चरण में कौशल और मूल्यों का एक निर्धारित सेट शामिल किया जाएगा।
  • सामाजिक स्तर पर, उच्चतर शिक्षा का उद्देश्य राष्ट्र को प्रबुद्ध, सामाजिक रूप से जागरूक, जानकार और सक्षम बनाना है जो अपने नागरिकों का उत्थान कर सके, और अपनी समस्याओं के लिए सशक्त समाधानों को ढूँढकर लागू कर सके। 
  • उच्चतर शिक्षा देश में ज्ञान निर्माण और नवाचार का आधार भी बनाती है और इसके चलते राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए उच्चतर शिक्षा का उद्देश्य व्यक्तिगत रोज़गार के अवसरों का सृजन करना ही नहीं बल्कि अधिक जीवंत और सामाजिक रूप से जुड़े हुए सहकारी समुदायों के साथ मिलकर एक अधिक खुशनुमा, सामंजस्यपूर्ण, सुसंस्कृत, उत्पादक, अभिनव, प्रगतिशील और समृद्ध राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करना है।

Problems in Higher Education

9.2 वर्तमान में, भारत में उच्चतर शिक्षा प्रणाली की कुछ प्रमुख समस्याओं में निम्नलिखित शामिल हैं:
  • गंभीर रूप से खंडित उच्चतर शैक्षिक पारिस्थितिकी तंत्र;
  • संज्ञानात्मक कौशल के विकास और सीखने के परिणामों पर कम बल;
  • विषयों का एक कठोर विभाजन, विद्यार्थियों को बहुत पहले ही विशेषज्ञ और अध्ययन के संकीर्ण क्षेत्रों की ओर ढकेल देना;
  • सीमित पहुँच, विशेष रूप से सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित क्षेत्रों में जहाँ कुछ एक ही ऐसे विश्वविद्यालय और महाविद्यालय हैं जो स्थानीय भाषाओं में पढ़ाते हैं;
  • सीमित शिक्षक और संस्थागत स्वायत्तता;
  • योग्यता आधारित करियर प्रबंधन और संकाय और संस्थागत लीडरों की प्रगति के लिए अपर्याप्त तंत्र;
  • अधिकांश विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में शोध पर कम बल और विषयक अनुशासनों में पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी-समीक्षा शोध निधियों की कमी;
  • उच्चतर शिक्षा संस्थानों में गवर्नेंस और नेतृत्व क्षमता का अभाव;
  • एक अप्रभावी विनियामक प्रणाली; और
  • बहुत सारे संबद्ध विश्वविद्यालय, जिनके परिणामस्वरूप अवर स्नातक शिक्षा के निम्न मानक।

Changes in Current Higher Education 

9.3 यह नीति उच्चतर शिक्षा प्रणाली में आमूल-चूल बदलाव और नए जोश के संचार के लिए उपयुक्त चुनौतियों को दूर करने के लिए कहती है। जिससे सभी युवा लोगों को उनकी आकांक्षा के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण, समान अवसर देने वाली एवं समावेशी उच्चतर शिक्षा मिले। इस नीति की दृष्टि में वर्तमान उच्चतर शिक्षा प्रणाली में निम्नलिखित प्रमुख परिवर्तन शामिल हैं:
  • ऐसी उच्चतर शिक्षा व्यवस्था की ओर बढ़ना जिसमें विशाल बहु-विषयक विश्वविद्यालय और महाविद्यालय हों, जहाँ प्रत्येक जिले में या उसके पास कम से कम एक और पूरे भारत में अधिकतर एचईआई ऐसे ही हो, जो स्थानीय / भारतीय भाषाओं में शिक्षा या कार्यक्रमों का माध्यम प्रदान करते हों;
  • और अधिक बहु-विषयक स्नातक शिक्षा की ओर बढ़ना;
  • संकाय और संस्थागत स्वायत्तता की ओर बढ़ना;
  • विद्यार्थियों के अनुभव में वृद्धि के लिए पाठ्यचर्या, शिक्षण-शास्त्र , मूल्यांकन और विद्यार्थियों को दिए जाने वाले सहयोग में आमूल-चूल परिवर्तन करना;
  • शिक्षण, अनुसंधान और सेवा के आधार पर योग्यता-नियुक्तियों और करियर की प्रगति के माध्यम से संकाय और संस्थागत नेतृत्व की स्थिति की अखंडता की पुष्टि करना;
  • सहकर्मी द्वारा समीक्षा की गई उत्तम अनुसंधान और विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में सक्रिय रूप से अनुसंधान की नींव रखने के लिए राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (एनआरएफ) की स्थापना;
  • शैक्षणिक और प्रशासनिक स्वायत्तता वाले उच्चतर-योग्य स्वतंत्र बोर्डों द्वारा एचईआई का गवर्नेंस;
  • व्यावसायिक (प्रोफेशनल) शिक्षा सहित उच्चतर शिक्षा के सभी एकल नियामक द्वारा "लचीला लेकिन स्थायित्व प्रदान करने वाला विनियमन;
  • उपायों की एक श्रृंखला के माध्यम से पहुँच, समता और समावेशन में वृद्धि: इसके साथ ही उत्कृष्ट सार्वजनिक शिक्षा के लिए अधिक अवसर; वंचित और निर्धन छात्रों के लिए निजी / परोपकारी विश्वविद्यालयों द्वारा छात्रवृत्ति में पर्याप्त वृद्धि; ओपन स्कूलिंग, ऑनलाइन शिक्षा, और मुक्त दूरस्थ शिक्षा (ओडीएल); और दिव्यांग शिक्षार्थियों के लिए सभी बुनियादी ढांचे और शिक्षण सामग्री की उपलब्धता और उस तक उनकी पहुँच।

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