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व्यावसायिक शिक्षा

व्यावसायिक शिक्षा

20.1 पेशेवरों को तैयार करने से जुड़ी शिक्षा के लिए यह अनिवार्य है कि उसके पाठ्यक्रम में नैतिकता और सार्वजनिक उद्देश्य के महत्व का समावेश हो, और इसके साथ ही साथ उस विषय विशेष की शिक्षा और व्यावहारिक अभ्यास की शिक्षा को भी शामिल किया जाए। अन्य समस्त उच्चतर शिक्षा से जुड़े विषयों की तरह ही इसके केंद्र में भी तार्किक और अंतःविषयी सोच, विमर्श, चर्चा, अनुसंधान और नवाचार को शामिल किया जाना चाहिए । इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि व्यावसायिक विकास से जुड़ी शिक्षा बाकी विषयों से कटी या अलग-थलग ना रहे।

20.2 इस प्रकार व्यावसायिक विकास की शिक्षा समग्र उच्चतर शिक्षा प्रणली का एक अभिन्न अंग बन जाएगी। स्टैंड-अलोन कृषि विश्वविद्यालयों, विधि विश्वविद्यालयों, स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालयों, तकनीकी विश्वविद्यालयों और अन्य-विषयों के स्टैंड-अलोन विश्वविद्यालयों का उद्देश्य अपने आप को एक बहु-विषयक संस्थान के रूप में विकसित करना होना चाहिए जो कि एक समग्र और बहु-विषयक शिक्षा मुहैया करवाए। व्यावसायिक या सामान्य शिक्षा प्रदान करने वाले सभी संस्थान वर्ष 2030 तक समेकित रूप से दोनों प्रकार की शिक्षा प्रदान करने वाले संस्थान या संस्थान-समूह बनने के लक्ष्य के साथ कार्य करेंगे।

20.3 कृषि शिक्षा और इससे संबद्ध विषयों को पुनर्जीवित किया जाएगा । यद्यपि देश के विश्वविद्यालयों में कृषि विश्वविद्यालयों का प्रतिशत 9 है लेकिन कृषि और संबद्ध विज्ञान विषयों में नामांकन उच्चतर शिक्षा के कुल नामांकन के 1% से भी कम है। कुशल स्नातकों और तकनीशियनों, नवीन अनुसंधान और तकनीकी तथा कार्य प्रक्रियाओं से जुड़े बाज़ार आधारित विस्तार के माध्यम से कृषि उत्पादकता को बढ़ाने के लिए यह आवश्यक है कि कृषि और संबद्ध विषयों की क्षमता और गुणवत्ता दोनों को बेहतर किया जाए। सामान्य शिक्षा के साथ जुड़ते कार्यक्रमों के माध्यम से कृषि और पशुचिकित्सा विज्ञान से जुड़े पेशेवरों की तैयारी में तेजी से वृद्धि की जाएगी । कृषि शिक्षा की प्रक्रिया को ऐसे व्यावसायिक व्यक्तियों के विकास के लिए परिवर्तित किया जाएगा जो कि स्थानीय ज्ञान, पारंपरिक ज्ञान, और उभरती हुई तकनीकों को समझ सकें और उसका उपयोग कर सकें, और इसके साथ ही साथ महत्वपूर्ण मुद्दों जैसे कि भूमि की गिरती उत्पादन शक्ति, जलवायु परिवर्तन, हमारी बढ़ती आबादी के लिए पर्याप्त भोजन की आवश्यकता, आदि को लेकर जागरूक हों। यह आवश्यक है कि कृषि शिक्षा प्रदान करने वाले संस्थानों से स्थानीय समुदाय सीधे-सीधे लाभान्वित हों, इसका एक तरीका हो सकता है कृषि प्रौद्योगिकी पार्क की स्थापना करना ताकि प्रौद्योगिकीय-इन्क्यूबेशन और इसके प्रसार और टिकाऊ तरीकों को बढ़ावा मिल सके।

20.4 विधिक शिक्षा को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने की आवश्यकता है, साथ ही इस क्षेत्र से संबन्धित बेहतरीन प्रक्रियाओं, कार्यप्रणालियों और नयी तकनीकों को अपनाया जाएगा जिससे कि सभी के लिए और सही समय पर न्याय को सुनिश्चित किया जा सके। साथ ही इसे सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय के संवैधानिक मूल्यों से संवर्धित एवं उनके आलोक में बनाया जाना चाहिए और लोकतन्त्र, कानून के शासन और मानवाधिकारों के माध्यम से राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की दिशा में निर्देशित किया जाना चाहिए। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि विधिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों के साथ-साथ साक्ष्य-आधारित तरीके से, विधिक विचार प्रक्रिया के इतिहास, न्याय के सिद्धांतों, न्यायशास्त्र के अभ्यास और अन्य संबंधित विषयों को उचित और पर्याप्त प्रतिनिधित्व हो। विधिक शिक्षा की पेशकश करने वाले राज्य संस्थानों को भविष्य के वकीलों और न्यायाधीशों के लिए द्विभाषी शिक्षा की पेशकश पर विचार करना चाहिए जिसमें एक भाषा अंग्रेजी और दूसरी उस राज्य की भाषा हो जिसमें यह विधिक शिक्षा संस्था स्थित है।

20.5 स्वास्थ्य शिक्षा को पुनर्कल्पित किए जाने की आवश्यकता है जिससे कि शैक्षिक कार्यक्रमों की अवधि, संरचना और डिजाइन, स्नातकों द्वारा निभाई जाने वाली भूमिकाओं के अनुरूप हो सकें। प्राथमिक देखभाल और माध्यमिक अस्पतालों में काम करने के लिए मुख्य रूप से अच्छी तरह से परिभाषित मापदंडों पर छात्रों का नियमित अंतराल पर मूल्यांकन किया जाएगा। यह देखते हुए कि हमारे लोग स्वास्थ्य सेवा में बहुलतावादी विकल्पों का प्रयोग करते हैं, हमारी स्वास्थ्य शिक्षा प्रणली को एकीकृत होना चाहिए - जिसका अर्थ है कि, एलोपैथिक चिकित्सा शिक्षा के सभी छात्रों को आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी (आयुष) की बुनियादी समझ होनी चाहिए, और ऐसा ही अन्य सभी प्रकार की चिकित्सा से संबच्चित विद्यार्थियों के विषय में भी लागू होगा। सभी प्रकार की हेल्थकेयर शिक्षा में निवारक स्वास्थ्य देखभाल (प्रिवेंटिव हेल्थकेयर) और सामुदायिक चिकित्सा (कम्यूनिटी मेडिसिन) पर अधिक जोर दिया जाएगा।

20.6 तकनीकी शिक्षा में डिग्री और डिप्लोमा कार्यक्रम शामिल हैं, उदाहरण के लिए, इंजीनियरिंग, प्रौद्योगिकी, प्रबंधन, वास्तुकला, टाउन प्लानिंग, फार्मेसी, होटल प्रबंधन और कैटरिंग आदि जो भारत के समग्र विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं। इन क्षेत्रों में न केवल कई दशकों तक पूरी तरह से योग्य व्यक्तियों की मांग जारी रहेगी, बल्कि इन क्षेत्रों में नवाचार और अनुसंधान सुनिश्चित करने के लिए संबंधित उद्योगों और उच्चतर शिक्षा संस्थानों के बीच घनिष्ठ सहयोग की भी अधिक आवश्यकता होगी। इसके अलावा, समस्त मानवीय उद्यमों और प्रयासों पर प्रौद्योगिकी के प्रभाव से तकनीकी शिक्षा और अन्य विषयों के बीच अंतर समाप्त होने की संभावना बढ़ती जा रही है। इस प्रकार, तकनीकी शिक्षा भी बहु-विषयक शिक्षण संस्थानों और कार्यक्रमों के भीतर पेश की जाएगी और अन्य विषयों के साथ गहराई से जुड़ने के अवसरों पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करेगी। भारत को स्वास्थ्य, पर्यावरण और दीर्घकालिक स्वस्थ जीवन में इनके महत्वपूर्ण अनुप्रयोगों के साथ, जिन्हें युवाओं के लिए रोजगार संवर्धन हेतु अवर स्नातक शिक्षा कार्यक्रम का हिस्सा बनाया जाएगा, अत्याधुनिक महत्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे कि जीनोमिक अध्ययन, जैव प्रौद्योगिकी, नैनोप्रौद्योगिकी, न्यूरोसाइंस के साथ ही साथ तेजी से प्रमुखता हासिल कर रहे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), 3-डी मशीनिंग, बड़े डेटा विश्लेषण, और मशीन लर्निंग क्षेत्रों में पेशेवरों को तैयार करने में भी अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए।

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